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“एक तरफ जश्न, दूसरी तरफ काला दिवस”

          पिछले वर्ष 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान किया उससे ठीक पहले आम लोगो को यही लगा था कि शायद प्रधानमंत्री मोदी भारत पाकिस्तान के कड़वे रिश्तों पर कुछ ठोस निर्णय लेंगे. पर नोटबंदी जैसी घोषणा आम लोगो के लिए युद्ध के ऐलान से भी ज्यादा घातक सिद्ध हुई. आने वाली 8 नवंबर को भारत में नोटबंदी हुए पूरा एक वर्ष बीत जायेगा. इस पूरे वर्ष के दौरान “नोटबंदी” नामक मुद्दे ने भारत में खूब सुर्खियाँ बटोरी हैं. फिर वो चाहे न्यूज़ चैनलों पर होने वाली डिबेट हों अथवा चुनावी जनसभाओं में आरोप प्रत्यारोप.         हालाँकि इस नोटबंदी का बड़े शहरो की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नही पड़ा लेकिन छोटे शहरों ने थोड़ी दिक्कतों का सामना जरुर किया क्यूंकि बड़े शहरो के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा डिजिटल पेमेंट का रास्ता अपना लिया, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ जनता को स्मार्टफ़ोन से साधारण मैसेज भेजने में भी दिक्कत हो, वहां सारा व्यापार, लेनदेन डिजिटल माध्यम से करना एक सपना ही लगता है. इन्ही मुद्दों को द्रष्टिगत रखते हुए...

“निर्मल होने की आस में मोक्षदायिनी गंगा”

       “गंगा” अपने आप में एक अलग संसार को समेटे हुए है. कोई इसे माँ मानता है तो कोई मोक्षदायिनी. हजारो सालों से अनवरत बहती हुई इस नदी पर देश के लाखो लोग निर्भर हैं, उनकी निर्भरता किसी भी रूप में हो सकती है, फिर चाहे वो खेती करने वाले किसान के रूप में हो अथवा पूजा करने वाले विद्वान की. गंगोत्री से निकलकर हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करके लाखो लोगो के जीवन यापन का साधन बनकर बंगाल तक जाने वाली गंगा आज अपनी स्वछता पर आंसू बहा रही है, और इसका सबसे बड़ा कारन जल प्रदुषण है. आज गंगा के प्रदूषित होने का कारण हमारी आस्था के नाम पर हर प्रकार के पूजा के सामानों को गंगा में प्रवाहित करना भी है. फक्ट्रियों से निकलने वाला कूड़ा, नालों से बहती गंदगी की धारे भी उतना ही योगदान कर रही है जितनी हम आस्था के नाम पर गंदगी फैला करके कर रहे है.        गंगा आज उदास है क्यूंकि माँ का दर्जा मिलने के बाद भी स्वछता/निर्मलता अभी भी उससे कोसो दूर है. गंगा आज उदास है क्यूंकि सरकारों को उसकी याद केवल उसके तटों पर होने वाले आयोजनों पर ही आती है. गंगा आज उदास है क...

“अंधविश्वास की चोटी कटना बहुत जरुरी”

        बीते लगभग एक पखवाड़े से देश के अलग अलग हिस्सों से चोटी कटने की अफवाहों ने जो जोर पकड़ा, वो अभी भी बदस्तूर जारी है. चोटी कटना, उसके बाद महिलाओं को बिल्ली जैसी आकृति दिखना, इन दो चीजों की समानताएं लगभग हर घटना में पाई गयी. चोटी कटना भी एक प्रकार का अंधविश्वास है. अन्धविश्वास ने उभरते भारत के सूरज के एक हिस्से (खासकर ग्रामीण तबके ) को अपनी जद में ले रखा है. जीवन के हर पग पर विज्ञानं और तकनीक के वर्चस्व की कहानी बिखरी पड़ी है पर फिर भी कुछ लोग दकियानूसी सोच का परचम बुलंद करना चाहते हैं. अंधविश्वास का अधिकाधिक प्रमाण केवल ग्रामीण क्षेत्रों में मिलता है चूँकि अंधविश्वास फ़ैलाने वाले, जिनकी दुकाने इन्ही के सहारे टिकी हैं, ये लोग कम पढ़े लिखे लोगों को अपने जाल में फंसाकर रुपया ऐंठते हैं.          अभी कुछ साल पहले गर्मियों में खबर फैली कि भगवान की मूर्तियाँ दूध पी रही है, शाम का वक़्त था, खबर सुनते ही मंदिरों में लाइने लग गयी. इन लाइनों में पढ़े लिखे लोग भी थे. इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि वर्तमान सम...

"पत्रकारों के भेष में घूमते दलाल"

“दलाल” इस शब्द से लगभग सभी व्यक्ति परिचित होंगे और सीधी एवं  स्पष्ट भाषा में कहा जाये तो दलाल उस व्यक्ति की कहते हैं जो क्रेता एवं विक्रेता के बीच की कड़ी बनकर किसी भी सौदे को बेचने में मदद करता है और बदले में उसका कुछ प्रतिशत कमीशन लेता है, इसी स्थिति में आजकल लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारों के भेष में घूम रहे दलालों से भरा हुआ है. हालाँकि सभी को इस दायरे में नही रखा जा सकता परन्तु सच्चाई यही है कि अधिकांश लोग छोटे मोटे, पत्रिका, अखबारों का सहारा लेकर पुलिस, पब्लिक पर अपना रोब गांठते नजर आते है.         चूँकि पत्रकारों के आने जाने पर प्रदेश में हर विभाग में आम आदमी से ज्यादा छूट प्राप्त है, बस इसी बात का फायदा उठाकर ये दलाल हर जगह अपनी बात फिट करवाते नजर आते है और सरकारी कर्मचारी इन्हें मीडियाकर्मी समझकर भविष्य में होने वाले नुकसान से बचना चाहता है.         सरकार द्वारा दी जाने वाली अधिकांश योजनाओं का एक बड़ा सच ये भी है उनमे से 70 प्रतिशत अपात्र लोग पात्र घोषित कर दिए जाते है, इन्ही चीज़ों के कारण ग्रामीण ...

"आसमानी बूंदों से बाढ़ तक का सफ़र”

भारत के लगभग सभी प्रदेश बाढ़ नामक शब्द से भलीभांति परिचित है. हालाँकि इसे सीधे तौर पर बाढ़ कहना गलत ही होगा , आसमान से तो केवल पानी की बूंदें बरसती है पर यहाँ धरती पर सरकार की नाकामी, बदइन्तजामी उसे बाढ़ का रूप दे देती है. बाढ़ से देश के सभी राज्य लगभग परिचित और पीड़ित हैं. हर साल बाढ़ आने के बाबजूद इससे होने वाली मौतों और जनहानि में लगातार इजाफा ही हुआ है. यही चीज़ यहाँ सरकारों के ऊपर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है कि आखिर समस्या की जानकारी होने के बाबजूद उसके निराकरण का पूर्ण प्रयास नही किया गया. आजकल देश का एक हिस्सा असम बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित है.            सरकार की तरफ से अपने कार्यालय में एसी में बैठकर मीडिया और चैनलों को बाईट में यह कहना कि “सरकार हर तरीके के कार्य में प्रतिबद्ध है एवं बाढ़ से ग्रसित लोगों की शिविरों में नियमित रूप से देखभाल हो रही है” नामक बड़े बड़े बयान देना तो आसान है, पर हकीक़त इससे कोसों दूर है. असम के स्थानीय लोगो के मुताबिक व्यक्तियों एवं मवेशियों को एक ही स्थान पर और एक ही समय खाना उपलब्ध कराया जाना सरकार की हीलाहवाली को दर्शाता है. देश...

पाकिस्तान बनने की राह पर "कश्मीर".

पाकिस्तान बनने की राह पर “कश्मीर”        भारत का मुकुट कहे जाने वाला कश्मीर की दशा से वर्तमान में लगभग सभी परिचित हैं| पिछले तीन वर्षो से लगातार यहाँ आतंकी घटनाओं में इजाफा ही हुआ है| कश्मीर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा यहाँ आने वाले पर्यटकों से होता है अर्थात पर्यटन यहाँ के लोगो के लिए कमाई का एक अच्छा साधन है, पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार कश्मीर सुलग रहा है, जल रहा है| और ये सब राजनीती खोने के डर की वजह से न लिए जाने वाले एक्शन की भी एक बड़ी वजह है| आतंकियों ने जिस तरीके से भारतीय सेनाओं को निशाना बनाकर ये घटनाएँ की है, उनसे साफ जाहिर है कि ये भारत की राष्ट्रभक्ति का ढोंग पीटने वाली सरकार को ठेंगा दिखाना है|        जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा पर हमला वो भी सावन के पहले पवित्र सोमवार को| यह साफ साफ एक साजिश के तहत एक धर्म विशेष को निशाना बनाकर किया गया| हर साल आयोजित होने वाली ये यात्रा हमेशा से ही सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बनकर सामने आती हैं| इस यात्रा में हमला उन व्यवस्था से अलग चलने वालो के लिए एक सबक भी है क्यू...

चमचो के सहारे टिकी 'राजनीति"

चमचो के सहारे टिकी “राजनीति” भारत में चमचो का इस्तेमाल आम तौर पर रसोईघर में ही होता रहा है| सारे बर्तन होने के बाद भी चमचे का स्थान सबसे अलग है.सभी तरीके का खाना बनाने के बाद उस खाने में स्वाद लाने के लिए विशेष रूप से चमचे का इस्तेमाल ही किया जाता है, ठीक उसी प्रकार भारत में वर्तमान समय की राजनीति में नेताओं के “चमचो” का विशेष महत्त्व है. चमचो से अभिप्राय उस प्राणी से है जो आपको नेता जी से मिलने का समय से लेकर, जुगाड़ तुगाड़ लगाकर आपके न होने वाले कार्यो को भी नेता जी द्वारा करवाए जाने वाले व्यक्ति से है. आज चमचो का राजनीति में अपना एक विशेष स्थान है. सत्ता में आने के बाद अपने अपने चमचो की तादात दिखने का चलन भी तेजी से बढ़ा है| इस प्रकार का चाव जो नेताओं में बढ़ा है वो उन्हें विलासी बना रहा है. जिस नेता का कोई चमचा नही होगा वो स्वयं किसी न किसी का चमचा होगा और जो खुद बड़ा नेता होगा उसके घर के बाहर तो चमचो की फ़ौज कड़ी हर वक़्त मिलेगी, जो दिन रात बस नेता जी की हाँ में हाँ और रामधुनी में लगी रहती है| ऐसे ही चमचो के कारण नेता भोपूं और निखट्टू भी होते जा रहे है तथा अपनि कैसेट इन्ही चमचो के सहा...

“राजनीतिक जाल में फंसता किसान”

           अभी हाल ही के दिनों में एक मुद्दा पूरे देश में जोर शोर से उठकर सामने आया, नाम था “किसान आन्दोलन”| सभी राजनीतिक पार्टियों ने किसानो के साथ छल किया है, ये तो जायज है पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए विपक्ष और विपक्षी पार्टियाँ किसानो को मोहरा बना लेंगी, ये किसी ने सोचा भी न होगा|           राजनीतिक दल द्वारा साम, काम, दंड, भेद सभी तरीके अपनाकर वोटो पर कब्ज़ा करना केवल वर्तमान की राजनीति रह गयी है| बस लालच किसी भी प्रकार का हो सकता है, चाहे वो शराब का हो या पूर्ण कर्ज माफ़ी का| परिणामस्वरुप पार्टियाँ और उनके प्रत्याशी नीतियों की बजाय सुविधाए की बातें ज्यादा करते नजर आते है| पहले चुनाव में लोक लुभावन वादे केवल दक्षिण तक ही सीमित थे परन्तु अब ये पूरे देश में फ़ैल चुके हैं| किसानो का एक बड़ा तबका भारत में है और इन्हें आसानी से अपने पाले में करना लगभग सभी पार्टियाँ अच्छे से जान चुकी है| दरअसल पूरे लोकतंत्र को सभी तरीको के लोकलुभावन नीतियों या कार्यक्रमों का एक जामा फना दिया जा चुका है| बीते म...