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"पत्रकारों के भेष में घूमते दलाल"

“दलाल” इस शब्द से लगभग सभी व्यक्ति परिचित होंगे और सीधी एवं  स्पष्ट भाषा में कहा जाये तो दलाल उस व्यक्ति की कहते हैं जो क्रेता एवं विक्रेता के बीच की कड़ी बनकर किसी भी सौदे को बेचने में मदद करता है और बदले में उसका कुछ प्रतिशत कमीशन लेता है, इसी स्थिति में आजकल लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारों के भेष में घूम रहे दलालों से भरा हुआ है. हालाँकि सभी को इस दायरे में नही रखा जा सकता परन्तु सच्चाई यही है कि अधिकांश लोग छोटे मोटे, पत्रिका, अखबारों का सहारा लेकर पुलिस, पब्लिक पर अपना रोब गांठते नजर आते है.
        चूँकि पत्रकारों के आने जाने पर प्रदेश में हर विभाग में आम आदमी से ज्यादा छूट प्राप्त है, बस इसी बात का फायदा उठाकर ये दलाल हर जगह अपनी बात फिट करवाते नजर आते है और सरकारी कर्मचारी इन्हें मीडियाकर्मी समझकर भविष्य में होने वाले नुकसान से बचना चाहता है.
        सरकार द्वारा दी जाने वाली अधिकांश योजनाओं का एक बड़ा सच ये भी है उनमे से 70 प्रतिशत अपात्र लोग पात्र घोषित कर दिए जाते है, इन्ही चीज़ों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के व्यक्ति रोज रोज सरकारी विभागों के चक्कर लगाने की बजाय ऐसे पत्रकार रूपी दलाल को पैसे देना उचित समझते हैं. एक हकीक़त ये भी है कि खुद को किसी न किसी प्रिंट मीडिया एवं पत्रिका हाउस के सहारे जोड़कर अपना काम निकलवाने वाले पत्रकारों को “पत्रकारिता” शब्द की परिभाषा तक नही पता होगी. सरकारी विभागों के रोज रोज चक्कर काटकर नये नये लाभार्थियों के काम करवाने वाले इन दलालों के रेट भी किसी से छुपे नही है, इसके अंतर्गत आवास योजना में 10 से 20 हजार, पेंशन के मामलों में शुरूआती तीन माह की पेंशन आदि.
       दरअसल इन मामलों में सबसे ज्यादा बड़ी गलती उन प्रिंट एवं मीडिया हाउस की है जो बिना किसी प्रकार की सच्चाई जाने इन दलालों को अपनी संस्था से प्रमाणित “पहचान पत्र” मात्र चंद रुपयों के लालच में जारी कर देते हैं, बस फिर शुरू होता है खेल. इन्ही पहचान पत्रों को आधार बनाकर ये दलाल सभी विभागों, पुलिस कर्मियों और यहाँ तक कि ट्रेनों में आरक्षित बोगी में बैठने से तक नही हिचकते. पत्रकारिता प्रतिस्पर्धा का पेशा है, प्रतिस्पर्धा से मतलब रिपोर्ट, स्टोरी, साहस से है पर आज इस पवित्र पेशे में ऐसे लोगों की एंट्री हो गयी है जो केवल अपने स्वार्थों की खातिर सरकार या राजनीतिक दलों के लिए काम करना अपना गौरव समझते हैं.
         पत्रकार समाज की वो कड़ी है जो अपने लेखन के दम पर सरकार और समाज के बीच एक मध्यस्थता का काम करता है पर बदलते परिवेश में यही मध्यस्थता काली कमाई का एक अहम् साधन बन चुका है. ऑनर किलिंग की घटनाओं में पीड़ित के घर पहुंचकर खबर लिखने, उसके बाद रिपोर्ट होने की धमकी देकर एक अनधिकृत रूप से रुपयों की सौदेबाजी करने वाले फर्जी पत्रकार पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं.
        आज पत्रकाररूपी दलालों का एक तबका दलाली कर रहा है, जिनकी संख्या बहुत कम है, वहीँ इसके दूसरी ओर इस बात को गर्व के साथ कहा जा सकता है कि एक तबका ऐसा भी है जो हमेशा पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना फर्ज पूरा करता रहा है. ढूढने पर आपको हर शहर  में दो चार ऐसे पत्रकारों के नाम मिल जायेंगे जो वाकई में पिछले कई दशको से अपनी पैनी और ईमानदारी के लेखन की दम पर उस जिले में अपनी अलग पहचान बनाये हुए है. इन पत्रकारों की खास बात ये है कि ये हमेशा से ही अपने लेखन से अपनी छवि को रोशन कर रहे है. वो बात अलग है देश में दलालों से अलग आशा एवं विश्वास का माहौल बनाकर गरीब एवं पिछड़े तबकों की आवाजें सरकार तक पहुचने वाले पत्रकारों को उनकी ही संस्था से अनदेखा किया जा रहा है.
         दलालों का बस एक ही मकसद रहता है कि किसी भी विपक्षी पार्टी के किसी नेता या सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर दो चार लाइन लिख देने के बाद अपने प्रिय राजनीतिक दल के मुखिया के सामने जाकर कुछ मूल्य की धनराशि का प्रस्ताव रख देते है और राजनीतिक व्यक्ति उसे सहजता से स्वीकार भी कर लेते है. सरकार को चाहिए की इन पत्रकार के रूप में घूम रहे बहरूपियों की पहचान कर इन्हें जनता के सामने लाया जाये एवं दण्डित किया जाये. सरकार द्वारा भी उपेक्षा के शिकार निर्भीक, इमानदार पत्रकारों को सम्मानित कर उनका मनोबल बढ़ाया जाये ताकि पिछड़े एवं गरीब लोगो की आवाजे सरकारों तक पहुचने का सिलसिला यूँहीं बना रहे.


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