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तृतीय केदार श्री तुंगनाथ महादेव यात्रा (पार्ट वन)


 (नोट- इस यात्रा वृत्तान्त में जैसा तीन दिन में मैंने यात्रा की है, जैसा अनुभव आंखो देखा किया है, वही आपके सामने हूबहू लाने की कोशिश करूंगा )


श्री तुंगनाथ महादेव पंच केदारो में तृतीय स्थान पर है, तुंगनाथ महादेव का मंदिर उत्तराखंड के जनपद रुद्रप्रयाग में चोपता नामक स्थान के पास है। चोपता नामक स्थान से तीन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद तुंगनाथ मंदिर स्थित है। मान्यता यह है कि यह मंदिर विश्व में सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित है। 

तो आते है मुद्दे पर, मैं जनपद शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश का निवासी हूं और एक सरकारी विभाग में संविदा पर कार्यरत हूं,

दरअसल पिछले दो सालों से लगातार यू ट्यूब पर विडियोज देखने के बाद  हमारा भी मन हो रहा था बाबा के दर्शन के लिए, पर प्रोग्राम बार बार किसी न किसी कारण टल रहा था, वो कहावत है ना कि जब बाबा बुलाते है तो आदमी भागा भागा जाता है, यही हुआ हमारे साथ। 

दो दिन पहले अचानक हमारे घुमक्कड़ दोस्त ने कॉल करके तुंगनाथ जाने के प्लान के बारे में बताया, कुछ देर सोचने के बाद इस शर्त के साथ हामी भरी कि कल संडे को ऑफिस की जरूरी मीटिंग के बाद प्रस्ताव रखेंगे छुट्टी का, अलग डायरेक्टर मान गए तो चलना पक्का है। हमसे ज्यादा हमारे छोटे भाई साहब इस यात्रा से खुश थे, क्यूंकि उत्तर भारत के प्रमुख तीर्थ स्थान पूर्णागिरी के अलावा अभी तक वे किसी भी अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में नहीं गए थे। 

पौढ़ी के रास्ते में कहीं शाम के वक़्त

अभी तक मैंने अपने जाने के संभावित प्लान के बारे में घरवालों के सामने अपने पत्ते नहीं खोले थे, संडे को सुबह ऑफिस जाने से पहले मा से मैंने जैकेट निकालकर धूप में डालने को बोला तो पीछे से पापा ने कहा कि अभी इतनी ठंड कहां जो जैकेट मांग रहे हो, तब मैंने कहा कि अगर आज छुट्टी मिली तो कल रुद्रप्रयाग निकल जाएंगे। 

अब मा पापा दोनों लोग एक दूसरे को देखने लगे, मैंने किसी भी प्रकार की डांट से बचने के लिए सेल्फ मारा और गाड़ी भगा दी।

शाम में ऑफिस की मीटिंग के बाद मैंने डायरेक्टर सर के सामने चार दिन की छुट्टी का प्रस्ताव रखा, थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने हां कर दी। 

बस इसी बात का इंतजार था, घर आकर मैंने तुरंत अपने दोस्त शोभित को फोन किया, उसने अपने एक और दोस्त (जिसकी गाड़ी से हम लोग जाने वाले थे उसे कॉल करके सुबह 8-9 बजे निकलने को बोला)

अब तुंगनाथ जी के दर्शन को जाने के लिए मै,  मेरा छोटा भाई, मेरा दोस्त शोभित और उसका दोस्त और इस यात्रा का एक अहम किरदार (हमारे ड्राइवर साहब) शोभित (संयोग से उनका नाम भी शोभित था) तैयार हुए। 

सुबह जाने की आस लेकर हम लोग जल्दी लेटने का असफल प्रयास करने लगे क्यूंकि जाने की उत्सुकता में नींद कोसों दूर थी। खैर अलार्म लगाकर सोए, सुबह उठते ही दस मिनट बाद शोभित का कॉल आया, 9 बजे तक शाहजहांपुर पहुंच रहा हूं तैयार रहो। 

दरअसल शोभित मेरे घर शाहजहांपुर से तीस किलोमीटर दूर निगोही कस्बे में रहता है और हम लोगो को वाया बरेली होकर जाना था लिहाजा तय समय पर शोभित बस स्टैंड पहुंचा, वहां मै पहले से उपस्थित था, गाड़ी में बैठते मेरा पहला सवाल शोभित से था कि कहीं देर तो नहीं हुई, 

अब जो हुआ देखा जाएगा यहां से तो निकलो - शोभित ने उत्तर दिया। 


हमे तुंगनाथ जी तक पहुंचने के लिए चोपता तक जाना था, जिसका एक रास्ता शाहजहांपुर बरेली किच्छा काठगोदाम भोवाली रानीखेत रुद्रप्रयाग था, दूसरा रास्ता शाहजहांपुर बरेली रामपुर मुरादाबाद नगीना धामपुर कोटद्वार पौढ़ी गढ़वाल श्रीनगर रुद्रप्रयाग था। 

इन दोनों रास्तों की अलग अलग खासियत ये थी कि पहले रास्ते में पहाड़ों पर ज्यादा चलना था, जिसमे निश्चित रूप से समय ज्यादा लगता, जबकि दूसरे रास्ते में पहाड़ों पर कम और प्लेन रास्ते पर ज्यादा चलना था, इस हिसाब से प्लेन अथवा समतल पर चलना भले 40 किलोमीटर ज्यादा जरूर था लेकिन पहाड़ों से बेहतर था। 

एक गाड़ी हम लोगो की गाड़ी से पहले ही केदारनाथ जी को गई थी, जिसमे मौजूद दोस्त ने बताया कि भूवाली के पास रास्ता बन्द है लिहाजा कोटद्वार से आओ। 

हम लोगो ने भी लगभग मन बना लिया था कोटद्वार वाले रास्ते से ही जाना है, बस स्टैंड से गाड़ी सीधे बरेली दिल्ली हाईवे पर लगा दी। 

बरेली पहुंचते पहुंचते भूख भी लगने लगी थी क्यूंकि नाश्ते के नाम पर केवल एक कप चाय पीकर भागे थे घर से, लिहाजा एक ढंग के ढाबे पर आलू के पराठे खाए और निकल पड़े मुरादाबाद की ओर। 

उत्तराखंड जाने के लिए सरकार की ओर से जारी निर्देश का पालन  करते हुए स्मार्ट सिटी देहरादून की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन करके उसका स्क्रीन शॉट फोन में पक्का किया, अब बस थोड़ी देर में उत्तराखंड की सीमा शुरू होने वाली थी, गाड़ी के कागज चेक किए तो पॉल्यूशन सर्टिफिकेट मिस था, इसलिए मुरादाबाद के पास एक पेट्रोल पंप के पास सर्टिफिकेट बनवाया और बढ़ चले आगे। 

मुरादाबाद से आगे कांठ रोड से धामपुर नगीना वाली रोड पर बढ़ चले, एक घंटे बाद दोपहर के तीन बजे हम लोग नगीना में थे, यहां रोड पर ही स्थित दुकान से समोसे लिए, जिस प्रकार से उन समोसो का प्रचार दुकान वाले ने किया था और जिस प्रकार की भीड़ उस दुकान पर थी, उसकी अपेक्षा समोसे अच्छे नहीं लगे क्यूंकि इससे सस्ते समोसे हमारे शहर में कई दुकानों पर मौजूद थे और हमने खाए हुए थे। खैर रास्ते में पेट भरना था तो सबने एक एक समोसा खाया, और फिर से बढ़ चले कोटद्वार की ओर। 

डेढ़ दो घंटे के बाद कोटद्वार से पौढ़ी की रोड पकड़ी, रास्ते पर लगभग अंधेरा शुरू हो चुका था, पहाड़ों पर जितनी जल्दी सवेरा होता है उतनी जल्दी अंधेरा भी। 

मैं इस रोड पर पहली बार यात्रा कर रहा था, पौढ़ी का इलाका गढ़वाल रीजन में आता है। मैंने अभी तक की अपनी पहाड़ की यात्रा कुमाऊ रीजन में ही की थी, उसकी अपेक्षा मुझे ये रोड बिल्कुल बेकार लगा, इसका पहला कारण इस रोड पर उम्मीद और अपेक्षा से कहीं अधिक घुमाव थे, दूसरा इस रास्ते पर अत्यधिक अंधेरा, बिजली कहीं कहीं नजर आती थी वो भी शायद सोलर वाली। होम स्टे और खानपान की दुकानें तो पिछले एक घंटे से नजर ही नहीं आ रही थी। हमारा आज का टारगेट कम से कम श्री नगर पहुंचने को था ताकि अगले दिन जल्दी निकलकर रुद्रप्रयाग होते हुए चोपता पहुंचे, लेकिन सुबह के 9 बजे के लगातार चले हुए अब हम थक चुके थे, दूसरी चिंता इस बात की कि अगर आगे गए और कहीं रुकने का ठिकाना मिला या नहीं तो क्या होगा, क्यूंकि गाड़ी में हम चारो लोग इस रास्ते पर पहली बार यात्रा कर रहे थे। एक जगह पौढ़ी से 20 किलोमीटर पहले रात्रि के आठ बजे एक चाय की दुकान पर पहुंचकर चाय और मैगी का ऑर्डर दिया, उस छोटी सी दुकान चलाने वालो ने शायद हम लोगो की आपस की बातो से अंदाजा लगा लिया था कि ये लोग रुकने का सोच रहे हैं। उसने हम लोगो से बातो बातों में कहना शुरू किया कि पौढ़ी काफी दूर है आपको 11 बजेगा, वहां महंगे है होटल और खाना। हम लोग चुपचाप उसकी बातें सुनते रहे, अंत में उसने अपना पासा फेंका कि चाहो तो आप हमारे यहां रूम में रुक जाओ, ठीकठाक रुपए लगा देंगे। 

हम लोगो ने एक कान से सुनकर दूसरे से उसकी बातो को निकाल दिया, गाड़ी में बैठकर थोड़ी ही दूर चले थे कि शोभित और छोटे भाई को सर घूमने की दिक्कत होने लगी, दरअसल ये अत्यधिक घुमाव वाले रास्तों के कारण था।

थोड़ी देर आराम करने के उपरांत फिर गाड़ी लेकर पौढ़ी पहुंचे, उक्त दोनों (लगभग बीमार) लोगो की सहमति से रात पौढ़ी में ही रुकने का निर्णय लिया, पौढ़ी में दो चार होटल ही टैक्सी स्टैंड के पास नजर आए, एक से बात बनी 1400 में रूम की, जिसमे चारो लोगो के रुकने की व्यवस्था थी, रूम के ऊपर ही रेस्टोरेंट था, थोड़ी देर आराम करने के बाद उसी रेस्टोरेंट में खाना खाया, और वापस आए अपने रूम में। 

सामने बालकनी से पौढ़ी का दृश्य अदभुत था, पूरा पौढ़ी लगभग सो चुका था, लाइट जगमग हो रही थी, सामने के पहाड़ों पर। 

वहीं बालकनी में बैठकर निहारता रहा पहाड़ों को तकरीबन आधे घंटे तक। फिर भाई ने कहा, आओ लेटो सुबह जल्दी निकलना है, जाकर लेटे तो कब नींद आयी पता ही न चला। 

(पहला दिन समाप्त हो चुका था)

क्रमशः .................

यात्रा का यू ट्यूब लिंक 👇👇

https://youtu.be/PSi5iPQA8-g

https://youtu.be/PSi5iPQA8-g










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