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तृतीय केदार श्री तुंगनाथ महादेव यात्रा- दूसरा दिन (पार्ट सेकेंड)


तृतीय केदार श्री तुंगनाथ महादेव यात्रा (दूसरा दिन)

दिनांक 10/11/2020

सुबह 4.00 बजे अलार्म बजा, रोज की आदत के अनुसार उसे 10 मिनट के लिए टैप किया, बढ़ाते बढ़ाते 4.30 तक ले गया, उम्मीद कर रहा था मैं कि शायद मेरे ना उठने पर और कोई बन्दा उठेगा और जरूरत समझते हुए जल्द निकलने के लिए बाकी सबको जगाएगा। पर मैं गलत था,  मेरे अलावा किसी और को कहीं भी जाने की जल्दी न थी, सब आराम से अपनी नींद पूरी कर रहे थे।

खैर कल रात में होटल वाले ने बताया था कि अटैच बाथरूम में गीजर की सुविधा है, पर अधिकतर होटलों में खासकर पहाड़ी सुदूर जगह पर यह सुविधा कहने के लिए तो हर होटल में उपलब्ध होती है पर सुबह जब आपको जरूरत होती है तब इस गीजर में कोई न कोई दिक्कत जरूर आती है, फिर आप अपने नहाने का प्रोग्राम या तो कैंसिल करते है या होटल वाले बन्दे को ढूंढते घूमते है, लिहाजा आपका अच्छा खासा वक्त खराब होता है लेकिन हमारे मसले में ऐसा नहीं हुआ, गीजर काम कर रहा था। मैं सबसे पहले उठकर फ्रेश होकर नहाया, उसके बाद बाकी लोगो का नम्बर लगा। आधे से पौन घंटे बाद सभी लोग निकलने के लिए तैयार थे। बाहर निकलकर चाबी रिशेपशन काउंटर पर रख दी क्यूंकि बाकी सभी जन सो रहे थे, बाहर 5.30 बज चुका था, सामने पौढ़ी शहर अल्साया हुआ मालूम पड़ रहा था, पहाड़ों के पीछे से हल्की सी लालिमा लिए हुए एक रोशनी दिखाई पड़ रही थी, दरअसल अब सूर्योदय होने वाला था। हमने अपनी गाड़ी श्री नगर की ओर बढ़ा दी, श्री नगर की दूरी तकरीबन 31 किलोमीटर थी, सुबह ट्रैफिक ना के बराबर था। बीच में एक जगह बेहतरीन स्थान पर रुककर फोटोग्राफी का सेशन चला। 7.30 के आसपास हम लोग श्री नगर में थे, श्री नगर में पौढ़ी से ज्यादा बेहतर होटल और सफाई थी। पौढ़ी की सड़को की अपेक्षा यहां ज्यादा चौड़ी और साफ सड़के थी। श्री नगर से रुद्रप्रयाग की दूरी 33 किलोमीटर थी जो पहाड़ों के हिसाब से तकरीबन सवा घंटा में पूरी हो जानी थी। सुबह से चले हुए दो घंटे होने वाले थे, रुद्रप्रयाग पहुंचने से पहले ही हाईवे पर बोर्ड लगा देखा, धारी देवी टेंपल 5 किलोमीटर, पता चला यह मंदिर पास ही है तो दर्शन करना बनता है.                        

धारी देवी को पहाड़ों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है, मैंने कहीं यह भी सुना है कि जून 13 में केदारनाथ में आपदा आने का कारण यह भी था कि किसी प्रोजेक्ट के तहत धारी देवी के मंदिर को हटाने का असफल प्रयास किया गया था, इसी से नाराज़ हुई देवी जी के प्रकोप से केदारनाथ में प्रलय आयी थी। (इन सभी बातों को मैं दावे के साथ नहीं कह सकता पर जहां बात आस्था और विश्वास की हो वहां कभी कभी इन सब बातो पर विश्वास करना बनता है) धारी देवी का मंदिर एक नदी के बीचोबीच बना है, नदी शायद अलकनंदा है। मंदिर जाने से पहले सामने दुकान से प्रसाद लिया, मंदिर के बाहर काफी बन्दर थे जो प्रसाद छीनने के प्रयास में थे, इसलिए प्रसाद को जैकेट में रखकर हम मंदिर पहुंचे, मंदिर का स्वभाव अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग था, मंदिर में बेइंतहा शांति थी, चुनिंदा बीस तीस लोग थे, जिनमे से पूजा कराने वाले अलग लाइन में और दर्शन करने वाले अलग लाइन में। 

हम लोग भी दर्शन करने वालों की लाइन में लग गए, थोड़ी ही देर में पंडित जी ने प्रसाद लेकर मा धारी देवी को अर्पित किया, तत्पश्चात हम लोगो के टीका लगाया, प्रसाद और आशीर्वाद लेकर हम वापस अपनी गाड़ी के पास लौट आए, पड़ोस में ही चाय की दुकान से चार चाय बनवाई और फिर निकल पड़े चोपता की ओर। 

हमारे दोस्त शोभित अतिआत्मविश्वास में गूगल मैप में गूगल बाबा के भरोसे आगे बैठकर चोपता का रास्ता बता रहे थे, मैंने बातो बातों में कहा भी कि ध्यान रखना दो चोपता है लेकिन शोभित ने मेरी बात काटते हुए कहा, अबे एक ही चोपता है। खैर शोभित के ही बताए रास्ते पर गाड़ी दौड़ रही थी पर मन में कहीं संशय था कि ये वो चोपता नहीं है जिसके बारे में पढ़ा और देखा है। चूंकि मै इस जगह पर नया था तो चुप रहा, शोभित इस जगह पर 2017 में केदारनाथ से बद्रीनाथ जाते समय रुका था। कुल मिलाकर बाकी तीनों व्यक्तियों को चौथे व्यक्ति शोभित पर भरोसा था। रास्ते में तुंगेश्वर महादेव मंदिर के नाम का बोर्ड लगा था तो भी यही लगा कि हो सकता है तुंगनाथ जी को लोकल भाषा में तुंगेशर जी भी कहा जाता हो, जब चोपता पहुंचे तो तुगेश्वर मंदिर नीचे की ओर बोर्ड लगा दिखाई पड़ा, तब माथा ठनका, लोकल के आदमी से पूछने पर पता चला कि ये भी एक गांव चोपता है पर ये वो चोपता नहीं है जहां से तृतीय केदार का रास्ता जाता है। 

कितनी दूर है वो मंदिर यहां से, पूछने पर लोकल व्यक्ति ने बताया कि तकरीबन 75 किलोमीटर। 

अब हम लोग बिल्कुल शांत थे, सुबह के 10 बजे दूसरे चोपता में खड़े हुए हम लोग एक दूसरे को निहार रहे थे, शोभित तो एक दम चुप था। दरअसल पहाड़ों पर 75 किलोमीटर का मतलब कम से कम दो घंटे से है। 

जाने का रूट पूछने पर लोकल वालो ने बताया कि पहले आप ऊखीमठ पहुंचोगे फिर चोपता। 

हम लोगो की चुप्पी का एक बड़ा कारण यह भी था कि चोपता से ट्रैक स्टार्ट करने का हमारा समय सुबह 8 बजे का था जो कि लगभग दो घंटे पहले ही लेट हो चुका था, अब 75 किलोमीटर और फेरा यानी 12.40 तक चोपता पहुंचना फिर कुछ खाना पीना और फिर रवानगी। डर ये भी था कि अगर देर से चढ़ाई की तो वापसी समय तक अंधेरा होना तय है।

अब जो होगा देखा जायेगा, यही विचार मन में बैठाए हम लोग अब सही चोपता की ओर बढ़ रहे थे। अगत्यमुनी होते हुए ऊखीमठ और बाद में चोपता के करीब हम लोग पहुंचने वाले थे, बीच बीच में चौखंबा पर्वतमाला के दर्शन हो रहे थे जो कि बर्फ से ढकी हुई थी। ये चोपता केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के अंतर्गत आता है, लिहाजा घने जंगल होने के कारण इस रूट पर अक्सर स्थानीय निवासियों को भालू, चीता के दर्शन होते रहते है। चोपता से तकरीबन पांच किलोमीटर पहले से ही कैंपिंग टेंट शुरू हो गए थे। टेंट में रुकने का भी अपना मज़ा है। खैर 12.40 पर हम लोग चोपता पहुंच चुके थे। गाड़ी से उतरकर देखा तो सामने का दृश्य बेहद शानदार और सुहावना था, जैसे किसी पेंटर ने कोई तस्वीर बनाई हो। दूर तक फैला बुग्याल और उसके बाद पहाड़ ही पहाड़। एक की लेयर खत्म तो दूसरा चालू। इन्हीं पहाड़ों में कुछ देर फोटोग्राफी की और पड़ोस में स्थित ढाबे पर मैगी और चाय का ऑर्डर दिया। यहां चाय के रेट 15 और मैगी 50 रुपए प्लेट थी। ऊंचाई और साधन की उपलब्धता के हिसाब से रेट ठीकठाक थे। 

 

               


मैगी खाते खाते दोपहर के 1.45 हो चुके थे। अब बारी थी तुंगनाथ जी के दर्शन के लिए प्रस्थान करने की। 

अपना सारा सामान गाड़ी में ही बन्द किया और बातो बातों में उसी ढाबे वाले ने रूम के लिए बताया जिससे वापसी में आने को बोलकर हम लोग आगे बढ़े। 

मैगी खाने के बाद हम लोग अब मंदिर की ओर जाने को तैयार थे, मुख्य द्वार से मंदिर को जाने वाले मार्ग से ठीक पहले दाहिनी ओर किराए पर छड़ी उपलब्ध कराने वाले की दुकान थी, दुकान में पीछे बूट भी रखे हुए थे शायद ज्यादा बर्फ जब गिरती होगी तो इन्हे भी किराए पर लिया जाता होगा। एक छड़ी 20 रुपए के हिसाब से किराया था और 40 रुपए प्रति छड़ी के हिसाब से जमा करना था, वापसी में छड़ी आपको वापस करनी थी और 20 रुपए प्रति छड़ी आपको वापस मिल जाना था। छड़ी की जरूरत मुझे लग तो नहीं रही थी लेकिन मेरा ये भ्रम टूटा तब जब हमने वापसी की थी। 

खैर छड़ी लेकर हम सबने द्वार पर लगा घंटा बजाकर तुंगनाथ बाबा को याद किया और शुरू कर दी चढ़ाई। शुरुआत की तकरीबन दो सौ मीटर की चढ़ाई आराम से हुई, उसके बाद जैसे जैसे हम कदम बढ़ाएं हम लोगो की सांसे फूलने लगी, हालांकि मैं जिम जाता हूं तो मुझे उतनी दिक्कत नहीं हो रही थी लेकिन बाकी तीनों की हालत देखने वाली थी। मेरी भी कोई खास अच्छी नहीं थी, क्यूंकि मैंने थोड़ी ठंडक और वापसी में ठंड के कारण जैकेट पहन ली थी जो मुझे अब हड़ रही थी, दरअसल चलते समय शरीर में गर्मी लग रही थी, लिहाजा जैकेट उतारकर दूसरे हाथ में पकड़ी, अब एक हाथ में छड़ी दूसरे में बहुत जरूरी पानी की बोतल, क्यूंकि पानी अब ऊपर तक उपलब्ध नहीं था। अब जैकेट को पेट पर बांधना मजबूरी थी। पांच सौ मीटर और चलने के बाद अब मैं मेरा भाई और ड्राइवर साहब यानी शोभित जी साथ थे, परन्तु हमारे मित्र शोभित अपने भारी वजन के कारण पीछे छूट चुके थे। 

आधा किलोमीटर और चलने के बाद हमारी हिम्मत ज़बाब दे रही थी, मेरा भाई तो पस्त पड़ चुका था, वो मेरी तरफ देखता तो मैं मुंह घुमा लेता, क्यूंकि मेरा मन था कि भले कुछ भी हो अब ऊपर जाना ही है लेकिन वो मेरी तरफ शायद इस उम्मीद में देख रहा था कि अगर इसे थकाई हुई तो शायद ये वापसी के लिए कुछ कहे और हम हां में हां मिला दें। हमारे ड्राइवर साहब फुर्तीले आदमी धीरे से मौका देखकर शॉर्टकट लेकर ऊपर चढ़ गए, पीछे पीछे हम लोग भी धीरे धीरे सही कदम टिकाते हुए चढ़ गए। मैं शॉर्टकट चढ़ने की सलाह को मानने के लिए आपसे नहीं कहूंगा क्योंकि कभी कभी ये रिस्की होता है, लेकिन जब परिस्थितियां ऐसी हो कि आपको शॉर्टकट से एक ऐसी दूरी तय करने को मिल जाए जिसपर आप परंपरागत रूट से काफी देर में पहुंच सकें और वह भी सेफ्टी के साथ कम समय में  तो वह शॉर्टकट बड़े आराम का होता है। 

एक आधा लीटर की पानी की बोतल और तीन लोग साथ में, उसपर से खड़ी चढ़ाई, बोतल में पानी मुश्किल से 100 एमएल रह गया होगा। अब नीचे से चले हुए पौन घंटे से ज्यादा हो चुका था। ऊपर से उतरते हुए एक व्यक्ति से मैंने पूछा कि भैया मंदिर कितनी दूर है ?

अभी भाई आप आधी दूरी तय किए हो, वो जो सामने वाली पहाड़ी देख रहे हो उसके जस्ट पीछे वाले पहाड़ पर स्थित है मंदिर - वह व्यक्ति बोला।

हम लोग एक दूसरे को मुंह फिर ताकने लगे, यह प्रश्न उस व्यक्ति से पूछने का आशय केवल इतना सा था कि शायद वह व्यक्ति ये कहता कि मंदिर आसपास है जिससे हम लोगो के अंदर भी थोड़ी और ऊर्जा आती, पर अफसोस अभी और चलना था। 

थोड़ी दूर चलने पर एक दिक्कत और खड़ी हुई हम लोगो के सामने, कि मेरा दोस्त शोभित हम लोगो से काफी दूर छूट गया था और मोबाइल में नेटवर्क भी नहीं थे। हम लोगो को उसका इंतजार करते हुए बीस मिनट से ज्यादा का समय हो चुका था, दिक्कत ये थी कि अगर वो वापस चोपता जाए तो फोन करके इत्तिला करे अथवा अब तक उसे इतनी दूर तो आ ही जाना चाहिए था कि ऊपर से हम लोगो को दिख जाए। 

पर यहां दूर दूर तक शोभित नहीं था, आवाज देने पर भी उधर से कोई उत्तर नहीं। 

अब हम तीनो ने मंथन किया कि क्या किया जाए, ड्राइवर साहब ने कहा कि भाई वो आयेगा जरूर भले, शाम हो जाए। ड्राइवर ने ही हम लोगो को ऊपर बढ़ने के लिए हिम्मत दी, ऊपर से आने वाले एक व्यक्ति से हमने पानी लिया थोड़ा, उसी व्यक्ति ने यह बताया कि ऊपर जाने पर मंदिर से डेढ़ सौ मीटर पहले ही एक पानी का सोता है, बस यह खबर सुकून देने वाली थी। हम लोगो ने अपने पैरो की रफ्तार बढ़ा दी। सामने की पहाड़ियों के बीच से केदारनाथ जाने वाले व्यक्तियों को हवाई सेवा से ले जाने वाले हेलीकॉप्टर साफ नजर आ रहे थे। केदारनाथ मंदिर घाटी में स्थित है और तुंगनाथ जी का मंदिर बिल्कुल ऊपरी छोर पर ।

ऊपर चलते चलते लगभग दो घंटे होने को आ चले थे, 3500 मीटर के करीब पहुंचने का अहसास हमें हर कदम पर हो रहा था, यहां ऑक्सिजन की कमी होने के कारण ही बार बार सांस फूल रही थी। खैर थोड़ा और आगे बढ़े तो सफेद रंग से रंगा मंदिर का कुछ हिस्सा दिखाई दिया, जिसने हमारी ऊर्जा में कुछ संचार किया। 

लगभग 15 मिनट के बाद हम मंदिर के मुख्य द्वार पर थे, थोड़ी देर खड़े होकर उसी गेट को ताकते और निहारते रहे कि आखिर जिस जगह का सपना और वीडियो ही अभी तक देखी थी, वह मंदिर अब सामने था। 

अंदर जाकर छड़ी और जैकेट एक किनारे रखी, हाथ धोकर सीधे बाबा के मंदिर के गेट के सामने बैठ गए। मंदिर बंद था, क्यूंकि बाबा के कपाट बंद होने का समय भी उत्तराखंड के चारो धाम की तरह ही नियत होता है, इस वर्ष 4 नवंबर को कपाट बंद हो गए थे और बाबा की डोली नीचे घाटी में स्थित मक्कूमठ में विराजमान थी। 

शीश नवाजने के बाद नतमस्तक होकर फिर से प्रणाम किया और थोड़े फोटो खिंचवाए, मोबाइल पर नजर दौड़ाई तो नेटवर्क फुल थे, लिहाजा घर पर कॉल करी, जिसे बाद में वीडियो कालिंग में तब्दील कर दिया। मंदिर परिसर में ही कई जगह बर्फ काफी पड़ी हुई थी, जो शायद एक या दो दिन पहले हुई बर्फबारी की वजह से जमी थी, नंगे पैरों से मंदिर परिसर में चलना एक चुनौती थी। 

घर वाले खुश थे, मन ही मन हम लोग भी बहुत ज्यादा उत्साहित थे। मंदिर में 25 मिनट गुजारने के बाद हम लोग बाहर बुग्याल में थोड़े फोटो लिए, छोटे भाई ने चंद्रशिला पर फहराने के लिए तिरंगा लाए थे जिसे उसी बुग्याल में किसी चट्टान पर खड़े होकर फहराया। हम लोगो की हिम्मत अब चंद्रशिला जाने की नहीं थी, दूसरा एक कारण यह भी था कि चंद्रशिला से वापस आते लोगो ने यही बताया कि ऊपर कोहरा होने के कारण हिमालय साफ नहीं दिखाई पड़ रहा है जो सीन आपको यहां से दिख रहा है वहीं वहां से भी। कहा ये जाता है कि चंद्रशिला से 360 डिग्री में हिमालय नजर आता है। 

 

खैर फोटोग्राफी के बाद हम लोग अब वापसी के रास्ते पर थे, धीरे धीरे नीचे उतरकर जब चलना शुरू किया तो छड़ी के होने का सही अनुमान हुआ, दरअसल वापसी में पैर अपने आप रुक नहीं रहे थे उन्हे छड़ी की बदौलत ही रोकना पड़ रहा था। 

तकरीबन 300 मीटर दूर वापस आने पर एकाएक नजर नीचे गई, ये शोभित था, जो धीरे धीरे ऊपर की ओर आ रहा था। शोभित ने आते ही प्रश्न किया कि चंद्रशिला क्यों नहीं गए। 

इतनी ऊंचाई पर देर से ही भले पर आने के बावजूद उसकी हिम्मत देखकर मैं हैरान था, खैर समझा बुझाकर उसे मंदिर की ओर रवाना किया, और हम लोग वही इंतजार करने लगे। 

लगभग आधे घंटे के बाद शोभित भी वापस आया और हम लोग साथ में ही उतरने लगे, वापसी में पहाड़ी भूटिया कुत्ता भी हम लोगो के साथ वापसी करने लगा, ये भूटिया कुत्ते बहुत तेज और वफादार होते है। कहा तो यहां तक जाता है कि ये गुलदार और चीते से भी भिड़ जाते है। ये ऊपर आने वाले पर्यटकों के साथ कुछ खाने पीने की आस में ऊपर तक आते है और उन्ही के साथ वापसी करते है। उसी तत्मयता देखकर मन ही मन मैंने सोचा कि इस जानवर की अगली योनि शायद बाबा की कृपा से बेहतर होगी। 

वापसी में हम लोग परंपरागत रूट से ही उतर रहे थे क्यूंकि पूरे रूट में कहीं भी लाइट नहीं थी और अंधेरा हो चुका था, हम लोग अपनी फोन की टॉर्च जलाकर उतर रहे थे। केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के अंतर्गत आने के कारण इस रास्ते पर जानवरो का भी खतरा था, हालांकि अभी हम लोगो के साथ आगे पीछे 15 लोग और थे, लेकिन जब लोग दिसंबर में ये ट्रैक करने आते है तब आम दिनों की अपेक्षा भीड़ कम होती है और तब इन जानवरों का खतरा भी ज्यादा होता है।

लगभग एक घंटे बाद हम लोग चोपता वापस लौट चुके थे, सुबह जिस ढाबे पर मैगी खाई थी उसी बन्दे से कमरे को लेकर बात हुई, उसने अपने ढाबे के नीचे बने कमरे को दिखाया जिसमे चार लोगो के लेटने का पर्याप्त इंतजाम था, किराया बताया एक हजार रुपए, जो बाद में आठ सौ पर राजी हुआ।  कमरे में बैग रखकर सबने अपने कपड़े बदले, पैरो मे नाम मात्र की जान बाकी थी, थोड़ा आराम करने के बाद दोस्त शोभित ने उसी ढाबे वाले से गर्म पानी मांगा, शायद उसके गले में खराश थी, जो इतनी ऊंचाई पर  ठंड में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। 

लगभग आधे घंटे बाद उसी रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद एक घंटे बाद कमरे में ही चाय भेजने के लिए हम लोग कहकर अपने अपने बिस्तर में जो घुसे और नींद कब आयी, पता ही न चला। एक घंटे बाद कमरे के गेट को जब चाय देने आए बन्दे ने खटखटाया तो सबकी आंख खुली। 

दरअसल जिस कमरे में हम रुके थे उसके सामने का व्यू वाकई मे शानदार और हैरान करने वाला था, यह बात हमें अलगे दिन सुबह पता चली थी। 

चाय पीने के बाद लेटे हुए अब तरह तरह के विचार मन में आ रहे थे कि कैसे संभव हुआ ये सपना, कैसे दो दिन में ही सब कुछ हो गया और हम मंदिर तक आ पहुंचे। यही सोचते सोचते रात हो चली थी, आंखें अब कह रही थी कि हमें बन्द कर लो, अब आराम दो। 

पार्ट सेकेण्ड की यू टयूब विडिओ का लिंक यह रहा 

https://youtu.be/1AgYJ7Xrxu4

क्रमशः.........




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