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सुकून चाहिए तो किशनपुर आइए।

किशनपुर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी जिले में स्थित दुधवा नेशनल पार्क का अभिन्न अंग है। दुधवा नेशनल पार्क खीरी जनपद के पलिया कस्बे में स्थित है जबकि किशनपुर के लिए आपको भीरा कस्बे से 6 किलोमीटर दूर कटैया गांव तक जाना पड़ेगा, जहां आप जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर जंगल की सफारी पर निकल सकते हैं। हालांकि जंगल के अंदर किशनपुर और दुधवा नेशनल पार्क जुड़ा हुआ है लेकिन जंगल के अंदर के रास्ते पर जाने की इजाजत केवल वन विभाग के कर्मियों को ही है, अगर आपको दुधवा से किशनपुर या किशनपुर से दुधवा जाना है तो आपको राष्ट्रीय राजमार्ग का ही सहारा लेना पड़ेगा।
दरअसल ऑफिस के है एक सहकर्मी पिछले लगभग 15 वर्षों से किशनपुर सेंचुरी जा रहे है, उन्हीं के परामर्श और साथ चलने की रजामंदी के बाद दिनांक 14 मार्च की सुबह किशनपुर के लिए चलना तय हुआ, इस ट्रिप में मेरे अलावा कुल पांच लोग और साथी बने।
जंगली ने हमेशा से ही मुझे मोहित किया है फिर चाहे उसका कारण वहां की हरियाली हो या प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण या फिर शहर कि चकाचौंध और दौड़भाग भरी जिंदगी से दूर शांति का एक वातावरण।

तय तारीख 14 को सुबह 9.30 बजे हम लोग तैयार होकर अपने ऑफिस पहुंचे, जहां बाइक को स्टैंड में लगाकर गाड़ी का इंतजार किया, जो हमारे घुमक्कड़ ऑफिस सहकर्मी द्वारा एक ट्रैवल एजेंसी से बुक कराई गई थी। 9.45 पर गाड़ी आई, सभी लोग बैठे और चल पड़े एक रोमांचक सफर की ओर। शाहजहांपुर जनपद जो कि मेरा निवास स्थान है वहां से किशनपुर सेंचुरी लगभग 80 किलोमीटर दूर है। शाहजहांपुर से पुवायां होते हुए खुटार से कुछ पहले हम एक फार्म हाउस पर रुके, जो हमारे ही एक नजदीकी मित्र का था। फार्म हाउस पर ही हल्का नाश्ता किया गया और फिर चल पड़े आगे के सफर की ओर। खुटार पहुंचकर तिराहे से रास्ता तीन तरफ परिवर्तित होता है, पहला खुटार से पूरनपुर, दूसरा खुटार से मैलानी - भीरा - पलिया एवं तीसरा खुटार से गोला। हमें दूसरे रास्ते पर जाना था, रोड एक दम चकाचक, मौसम भी एक दम साथ दे रहा था, हल्के बादल होने के कारण तथा तराई के इलाके में होने के कारण हवा में ठंडक का एहसास भी हो रहा था। खुटार से मैलानी तक आते आते 20 मिनट से ज्यादा समय लग चुका था। समय दोपहर का 12.30 बज चुका था, अभी भी सफारी शुरू होने में दो घंटे का समय था, तभी सभी ने मिलकर तय किया कि मढ़ा बाबा स्थान चलते है, मढ़ा बाबा स्थान मैलानी कस्बे से 15 किलोमीटर दूर जंगल में स्थित एक प्राचीन मंदिर है जिसकी आसपास के कस्बे में काफी मान्यता है, कहा तो यहां तक जाता है कि मढ़ा बाबा का आशीर्वाद लेने आज भी एक टाइगर 24 घंटे में एक बार मंदिर के पास जरूर आता है। हालांकि मंदिर तक जाने का रास्ता वन्यजीवो की चहलकदमी इस समय ज्यादा होने के कारण बंद है। जंगल के बाहर एक स्थान पर मढ़ा बाबा के नाम से एक मंदिर बना दिया गया है जिसपर पूजा होती है। हम लोगो को प्राचीन मंदिर तक जाना था लिहाजा वन विभाग के एक कर्मी को साथ लेकर बैरियर पहुंचकर स्पेशल परमिशन के हकदार बने तथा मंदिर पहुंचकर दर्शन किए। मंदिर ही बिल्कुल शांत वातावरण में अपनी अलग ही छवि बिखेर रहा था। दर्शन करने के बाद वापस लौटकर उन वन कर्मी साहब को धन्यवाद कहा और चल पड़े भीरा कस्बे की ओर। लगभग 30 मिनट जंगली के बीच बने हाईवे पर ठंडी हवाओं के झोखों के साथ हम करीब 1.50 पर भीरा पहुंचे, बीच बीच में लगे साइन बोर्ड जंगली क्षेत्र का हवाला देते हुए हमें कम स्पीड में गाड़ी चलाने की सख्त हिदायत दे रहे थे। भीरा से फिर दो रास्ते कटते है, एक सीधा पलिया होते हुए दुधवा नेशनल पार्क व नेपाल चला जाता है तथा दूसरा किशनपुर के लिए। किशनपुर पहुंचकर देखा तो वहां काफी पर्यटक अपनी गाड़ियों से पहुंच चुके थे तथा जरूरी कार्यवाही पूर्ण कर सफारी के लिए पार्क प्रशासन की ओर से तय जिप्सियों पर बैठ रहे थे, किशनपुर ऑफिस से आगे एक बैरियर पड़ता है जो सफारी के समय ही खुलता है, इस बैरियर के खुलने का नियत समय सुबह की सफारी में 6 बजे व शाम में 2.30 बजे है। हम सभी लोगो ने अपने अपने फॉर्म भरकर व जरूरी फीस चुकाकर जिप्सी में जगह ली। सेल्फियो का दौर लगातार जारी था। नियत समय पर हमारी गाड़ी ने बैरियर को क्रॉस किया, जंगल में घुसते ही गाइड ने शांत रहने के सख्त निर्देश दिए, गाइड के मुताबिक जंगल के 100 प्रतिशत हिस्से में से केवल 20 प्रतिशत हिस्सा जो कि तकरीबन 30 किलोमीटर का है, ही पर्यटन हेतु खोला गया है, बचे 80 प्रतिशत हिस्से पर केवल वनाधिकारी व जंगल के राजा का अधिकार है।

बादल ज्यादा घिर चुके थे, गाइड से पूछा तो बोला कि अगर बारिश न हुई तो टाइगर दिखने की उम्मीद ज्यादा है। हम लोगो के दिलो में मौसम को देखकर अजीब सी बेचैनी थी, क्यूंकि कहावत सुनी हुई थी, " जंगल की गर्मी, जंगल की सर्दी और जंगल की बरसात सहना, हर किसी के बस की बात नहीं"।
घूमते हुए करीब 10 किलोमीटर दूर गेस्ट हाउस के पास पहुंचे, यहां हाथी (जो कि विशेषकर पेट्रोलिंग के लिए रखे गए है) उनकी सफाई चल रही थी, दो चार फोटो फ्रेम में लिए, तभी कैंटीन की तरफ जाते समय नजर एक हिरण पर पड़ी जो कि उस कैंटीन में आने वाले पर्यटकों से खाने को कुछ मिलने की उम्मीद लगाए एकटक देख रहा था, दो तीन बिस्किट दिए फिर गाइड के मना करने पर हम वापस अपनी जिप्सी में आ गए। जिप्सी पर गाइड का सख्त निर्देश था कि कोई भी व्यक्ति जंगल में गाड़ी से नहीं उतरेगा, यूपी वालो की आदत के अनुसार हर सवाल पर क्यो करने पर गाइड ने बताया कि आपको भले जंगल में कुछ न दिख रहा हो मगर वो जानवर आपको लगातार देख रहे है। गेस्ट हाउस से आगे बढ़ने पर हिरनों के झुंड, नीलगायों के झुंड, जंगली सुअर के झुंड, मोर आदि जीवजंतु दिखाई पड़े जो हमारी जिप्सी को देखते ही जंगल की ओर दौड़ लगा देते। घूमते हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा का समय व्यतीत हो चुका था पर टाइगर न दिखने से सब मायूस थे, गाइड से सभी ने एक स्वर में बोला कि जहां टाइगर दिखने की उम्मीद सबसे ज्यादा हो, वहीं ले चलो, गाइड ने मौसम का हवाला देते हुए कहा कि अब शायद इस मौसम में टाइगर बाहर निकले, क्यूंकि बूंदाबांदी भी तेज हो चुकी थी लेकिन गाइड यहीं पर नहीं रुका, उसने एक बात ये भी कही कि सुबह की सफारी में एक मादा फीमेल टाइगर अपने 5 बच्चो के साथ इसी रोड पर देखी गई है, लिहाजा शाम में वो वापसी जरूर करेगी।
यह खबर हमें संतोष देने वाली थी। सभी के चेहरे खिल गए, थोड़ा आगे बढ़कर एक घने पेड़ के नीचे गाड़ी लगाकर हम बारिश के हल्के होने का इंतजार करने लगे।

20 मिनट के इंतजार के बाद सामने से आती एक जिप्सी की लाइटे डिपर के रूप में जलने बुझने लगी, हमारे गाइड ने दूरबीन लगाकर देखा, दरअसल यह एक इशारा था एक ड्राइवर का दूसरे ड्राइवर को, कि टाइगर आसपास ही है, तभी अचानक कालिंग हुई, हिरण और जंगली सुअर की अजीबोगरीब आवाजे आ रही थी जो कि अन्य जानवरों को टाइगर के होने का संदेशा दे रही थी। इसी पूरे प्रकरण को वाइल्डलाइफ भाषा में कालिंग कहा जाता है। सामने वाली जिप्सी की ओर हमने अपनी गाड़ी बढ़ाई, करीब सौ मीटर चलने के बाद सामने की जिप्सी के ड्राइवर ने रुकने का इशारा किया, पांच मिनट तक सभी की नजरें सामने की ओर गड़ी हुई थी तभी एक दम से हलचल हुई, एक जंगली सुअर के पीछे भागती मादा टाइगर ने रोड क्रॉस किया, तकरीबन ढाई मीटर लंबी बाघिन , वो भी गाड़ी से बमुश्किल तीन मीटर की दूरी पर देखकर जिप्सी पर मौजूद सभी लोगो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई, गाइड भी खुश था लेकिन चुप रहने का इशारा भी कर रहा था। हालांकि शिकार के इस खेल में उस मादा टाइगर की निराशा हाथ लगी, जंगली सुअर ने उसे चकमा दे दिया था, जिप्सी पर मौजूद सभी लोगो ने फोटो और वीडियो बनाना जारी रखा था, इस दो मिनट के शो ने दिनभर की थकान, चेहरे पर छायी मायूसी पूरी तरह दूर हो चुकी थी, अब मादा टाइगर धीरे धीरे आंखो से ओझल हो रही थी।
गाइड से थोड़ा और इंतजार करने को बोलकर हम लोग उसी जगह 15 मिनट खड़े रहे, पर मादा टाइगर वापस न आई। गाइड के कहे अनुसार एक दूसरी रोड पर हम लोग तकरीबन 10 मिनट उसी टाइगर का इंतजार दोबारा किया गया पर मादा टाइगर वहां भी न आई। गाइड के अनुसार अब मादा टाइगर रात में निकलेगी। हमारी टोली बहुत ही मस्ती करती हुई अब जंगल से वापस किशनपुर प्रवेश द्वार आ गई, यहां आकर पुनः सभी कागजी कार्यवाही पूर्ण करनी होती है। शाम में लगभग 6.30 बज चुके थे, अब बारी थी लौटने की, जंगल की बेहतरीन यादें लेकर हम लौट रहे थे अपने अपने घरों की ओर, जंगल के वातावरण से बाहर आकर अजीब से शोर, माहौल से सामना होना शुरू हो चुका था, और अब उन तीन घंटों के स्वच्छ वातावरण से कोलाहल, प्रदूषण युक्त वातावरण में दोबारा ढलने की आदत डालने को अपने अपने तरीको से अपने अपने दिल को समझा रहे थे पर एक वादा करके आए थे जंगल से कि "फिर आना है तुम्हे जीने, तुम्हे महसूस करने क्यूंकि जंगल ही हमें सिखाता है कठिन और विपरीत परिस्थितियों से। जंगल ही हमें बताता है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ मत करो और जंगल ही हमें सिखाता है कि जंगल है तो मानव है।


कैसे पहुंचे किशनपुर -- किशनपुर पहुंचने के लिए आपको जनपद लखनउ से लखीमपुर खीरी आना पड़ेगा, फिर वहां से भीरा कस्बे से होते हुए किशनपुर पहुंचा जा सकता है, दूसरा विकल्प जनपद शाहजहांपुर से सीधे पुवायां, खुटार, मैलानी होते हुए भीरा कस्बे तक पहुंचा जा सकता है। शाहजहांपुर, दिल्ली व लखनउ से ट्रेन व सड़क मार्ग से 24 घंटे जुड़ा है।


किशनपुर घूमने का उपयुक्त समय -- किशनपुर और दुधवा नेशनल पार्क 15 जून से 15 नवम्बर तक बारिश के कारण बन्द रहते है, बाकी समय खुले रहते हैं। घूमने का बेहतर समय मार्च, अप्रैल है।


आसपास के मुख्य स्थान -- किशनपुर घूमने आए पर्यटक जनपद पीलीभीत होते हुए प्रसिद्ध गुरुद्वारा नानकमत्ता साहिब के दर्शन भी कर सकते है, इसके अलावा पास ही में पलिया कस्बे से थोड़ी दूर पर ही नेपाल  का धनगढ़ी जिला है, जिसकी मार्केट भी घूम सकते है।












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