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अप्रैल, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शहीदों के परिवारों की मदद " एक सराहनीह पहल"

सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए 25 सीआरपीएफ के जवानों के बच्चो की शिक्षा की पूरी जिम्मेदादी गौतम गंभीर के द्वारा लेना वाकई में सराहनीह पहल है। इस तरीके की मदद से हम उन परिवारों का पूरा तो नही लेकिन कुछ हद तक दर्द तो कम ही कर सकते हैं। इन जवानो के उपर अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी होने के साथ साथ देश की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी थी।

"नक्सलवाद" सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती

1968 में पश्चिम बंगाल के "नक्सलबाड़ी" गाँव से शुरू हुआ नक्सलियों का आन्दोलन आज इतने व्यापक स्तर पर भारत में अपने पैर पसार चुका है कि भारत के बिहार राज्य के 23 जिले झारखण्ड के 21 उत्तर प्रदेश के 3 महाराष्ट्र के 6 एवं छत्तीसगढ़ के 20 जिले इसकी चपेट में आ चुके हैं। सरकार को इनके बढ़ते हुए ग्राफ पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा। सुकमा में हुए हमले में 26 जवानो को खोने के बाद केवल कड़ी निंदा करके सरकार ने अपना पल्ला झाड़ लिया। इस प्रकार की प्रतिक्रिया ये साफ दर्शाती है कि अभी भी बीजेपी की जीत का खुमार नही उतरा है। राष्ट्रभक्त और देशभक्त सरकार का दंभ भरने वाली बीजेपी सरकार पर सवाल उठना भी लाजमी है क्यूंकि वर्तमान समय में खुफियां एजेंसी जो कि सरकार के अधीन आती हैं,उनके इनपुट कैसे नही मिल पाए? केवल कड़ी निंदा करनी होती तो पिछली सरकार में क्या बुराई थी ये सवाल भी बीजेपी के लिए सिरदर्द बन जायेगा। सरकार अगर अगले 10 दिन बाद इस हमले का बदला लेकर अपनी पीठ थप थपाएगी, तो विपक्ष का सवाल भी उठना लाजमी है कि ये बदला लेने की नौबत आखिर क्यों आई??? खैर केवल इतना कहना चाहूँगा कि "नही चाहिए तु...

रसूख दिखाने के यंत्र पर कसा शिकंजा

भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा लाल बत्ती पर रोक एक सराहनीय कदम है। लाल बत्ती वर्तमान के समय में केवल और केवल एक रसूख दिखाने का कारण बन गयी थी। ये बात आम जन के बीच भी बैठ गयी थी कि कोई नेता कितना पावरफुल है, इस बात का अंदाजा उसकी गाड़ी में लगी लाल बत्तियो से लगाया जाने लगा था। आम जनता के बीच से चुनकर आने वाले जन प्रतिनिधि सत्ता के गलियारे में आते ही अपनी जीवनचर्या बदलने के साथ ही "हुकूमत"दिखाने में लाल बत्ती का सर्वाधिक प्रयोग करते थे। सबसे पहले उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा लाल बत्ती पर रोल और उसके बाद मोदी द्वारा सभी मंत्रियों की गाडियों  पर लाल बत्ती की रोक ये दिखाने के लिए काफी है कि अब जनप्रतिनिधियों को जनता के दुःख दर्द समझने के लिए जमीन पर आना ही पड़ेगा। अभी तक केवल गाड़ियों में बैठकर हूटर बजाकर सड़कों पर हो हल्ला काटते नेताओं को ये एक सबक के रूप में है। लाल बत्ती का सर्वाधिक उपयोग उत्तर प्रदेश में बाहुबली टाइप क़े नेताओं के द्वारा सर्वाधिक होता था। जो जनता के बीच अपना एक प्रभुत्व और डर दिखाकर ये जताने की कोशिश करते थे कि अब सर्वेसर्वा हम ही है। मोदी के लाल ब...

पटरी से उतरता रेलवे

रेलवे में हो रही लगातार घटनाओ की वजह चाहे जो भी हो पर एक बात तो साफ़ है की कहीं न कहीं मानको की अनदेखी जरुर की जा रही है| ऐसा इसलिए और साफ होता है की जब देश का प्रधान सेवक देश में हाई स्पीड “बुलेट ट्रेन” चलाने की बात करता है अथवा सोचता है उसी समय हमारे देश की ट्रेने जोकि पुराने ढर्रे पर चल रही है(एक्सप्रेस एवं पैसेंजर) वही दुर्घटनाग्रस्त हो रही है| पिछले १ साल की ही अगर हम बात करें तो कानपुर में हुआ रेल हादसा ये बताने के लिए काफी था की रेलवे किसके भरोसे चल रहा है| हादसे होने के बाद जागे अधिकारी मुआवजों का एलान कर बात पर पर्दा डालने की तयारी में जुट जाते है| भारत एक विकासशील देश है यहाँ प्रतिदिन लोगो की भीड़ बढ़ ही रही है| रेलवे को ये समझना ही होगा की रेलवे में यात्रा करने वाला ६० प्रतिशत भारतीय मध्यम वर्ग का होता है, वो मध्यम वर्ग का आदमी कहाँ से बुलेट ट्रेन का हाई किराया भर पायेगा|      रेलवे में बढ़ रही भीड़ का एक कारण ये भी है कि अभी हाल ही में देखा गया की गतिमान जैसी सेमी हाई स्पीड ट्रेन के डिब्बे आधे से भी खाली गये, जबकि उसी रूट पर पीछे चल रही ट्रेनों में आरक्षण करवाकर स...

“मिड डे मील से शिक्षा होती निल”

            सरकार की कुछ नीतियाँ मेरे समझ से परे हैं इनमे से एक योजना मिड डे मील भी है| जोकि परिषदीय विद्यालयों में बच्चो को दोपहर का भोजन देने की है| मेरे समझ से बाहर है कि सरकार ये क्यों नही समझती कि क्यूँ प्राइवेट स्कूल के बच्चे, सरकारी स्कूलों से आगे और अच्छे हैं| जाहिर है एक बात का सीधा सा जबाब वहां की शिक्षा व्यवस्था एवं गुड़वत्ता से है| तो क्यूँ आज हम ऐसे दौर में जी रहे है जहाँ बच्चो को पढाई   के लिए प्रेरित करने हेतु मिड डे मील बाँटने का सहारा लिया जा रहा है| हम पढाई का स्तर निरंतर नीचे गिराते जा रहे है परन्तु मिड डे मील में रोज इजाफा करते जा रहे हैं, यहाँ तक की पिछली सरकार तो थाली   चम्मच भी बाँटने से नही हिचकी| आने वाले दिनों में इससे इनकार भी नही किया जा सकता कि जिस प्रकार से रोज मिड डे मील के साधनों में बढ़ोत्तरी हो रही है तो उस प्रकार से कल को स्कूलों   में सब्जियां और फल भी बंटने लगेंगे| तो तब इनको विद्यालय नही बल्कि राशन पानी की दुकान कहना उचित होगा| हम सरकार के ऊपर आरोप नही मढ़ रहे बल्कि ये ब...

आखिर कब जड़ेगा "मधुशाला" पर ताला ????

सत्ता बदलने के साथ ही वर्तमान समय में पूरे उत्तर प्रदेश में पूर्ण शराब बंदी को लेकर आवाजे काफी तेजी से उठने लगी हैं और कहीं कहीं ये आवाजें महिलाओं के द्वारा हिंशक रूप भी ले रही हैं. ये आवाजें  पिछली सरकार में भी उठाई गयी थी पर शायद सत्ता की हनक में आम आदमी की "एक सामाजिक बुराई के प्रति" आवाज दब कर रह गयी. एक रिपोर्ट के मुताबिक शराब पीकर एक्सीडेंट, मारपीट के मामले उत्तर प्रदेश में पिछले कई सालों से लगातार वृद्धि कर रहे हैं. यह बात भी सही है कि शराब एकदम से राज्य भर में बंद नही की जा सकती पर सरकार एक स्तर पर शुरुआत तो कर ही सकती है. उत्तर प्रदेश से सटा "बिहार" राज्य में जब पिछले वर्ष नीतीश सरकार द्वारा शराब बंदी की गयी तो उत्तर प्रदेश में तत्कालीन सरकार द्वारा शराब के दाम काफी कम कर दिए गये थे. तात्कालिक सरकार की ये स्थिति साफ साफ बयाँ करती है कि कल्याणकारी राज्य का दंभ भरने वाली सरकारों के लिए शराब राजस्व जुटाने का एक अच्छा साधन बन चुकी थी. राजस्व जुटाने का यह माध्यम लोगों की जाने लील रहा है, आपराधिक गतिविधियों को बढ़ा रह है. शराब तो राजनेताओं की हर जरूरत में शाम...