भारत के प्रधानमंत्री के द्वारा लाल बत्ती पर रोक एक सराहनीय कदम है। लाल बत्ती वर्तमान के समय में केवल और केवल एक रसूख दिखाने का कारण बन गयी थी। ये बात आम जन के बीच भी बैठ गयी थी कि कोई नेता कितना पावरफुल है, इस बात का अंदाजा उसकी गाड़ी में लगी लाल बत्तियो से लगाया जाने लगा था।
आम जनता के बीच से चुनकर आने वाले जन प्रतिनिधि सत्ता के गलियारे में आते ही अपनी जीवनचर्या बदलने के साथ ही "हुकूमत"दिखाने में लाल बत्ती का सर्वाधिक प्रयोग करते थे।
सबसे पहले उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा लाल बत्ती पर रोल और उसके बाद मोदी द्वारा सभी मंत्रियों की गाडियों पर लाल बत्ती की रोक ये दिखाने के लिए काफी है कि अब जनप्रतिनिधियों को जनता के दुःख दर्द समझने के लिए जमीन पर आना ही पड़ेगा। अभी तक केवल गाड़ियों में बैठकर हूटर बजाकर सड़कों पर हो हल्ला काटते नेताओं को ये एक सबक के रूप में है।
लाल बत्ती का सर्वाधिक उपयोग उत्तर प्रदेश में बाहुबली टाइप क़े नेताओं के द्वारा सर्वाधिक होता था। जो जनता के बीच अपना एक प्रभुत्व और डर दिखाकर ये जताने की कोशिश करते थे कि अब सर्वेसर्वा हम ही है। मोदी के लाल बत्ती पर रोक इन नेताओं की ऐसी सोच और ऐसी हरकतों पर विराम लगाएगा।
अपूर्व बाजपेयी
शाहजहांपुर।
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