रेलवे में हो रही लगातार घटनाओ की वजह चाहे जो भी हो पर एक बात तो साफ़ है
की कहीं न कहीं मानको की अनदेखी जरुर की जा रही है| ऐसा इसलिए और साफ
होता है की जब देश का प्रधान सेवक देश में हाई स्पीड “बुलेट ट्रेन” चलाने
की बात करता है अथवा सोचता है उसी समय हमारे देश की ट्रेने जोकि पुराने
ढर्रे पर चल रही है(एक्सप्रेस एवं पैसेंजर) वही दुर्घटनाग्रस्त हो रही
है| पिछले १ साल की ही अगर हम बात करें तो कानपुर में हुआ रेल हादसा ये
बताने के लिए काफी था की रेलवे किसके भरोसे चल रहा है| हादसे होने के बाद
जागे अधिकारी मुआवजों का एलान कर बात पर पर्दा डालने की तयारी में जुट
जाते है| भारत एक विकासशील देश है यहाँ प्रतिदिन लोगो की भीड़ बढ़ ही रही
है| रेलवे को ये समझना ही होगा की रेलवे में यात्रा करने वाला ६० प्रतिशत
भारतीय मध्यम वर्ग का होता है, वो मध्यम वर्ग का आदमी कहाँ से बुलेट
ट्रेन का हाई किराया भर पायेगा|
रेलवे में बढ़ रही भीड़ का एक कारण ये भी है कि अभी हाल ही में देखा
गया की गतिमान जैसी सेमी हाई स्पीड ट्रेन के डिब्बे आधे से भी खाली गये,
जबकि उसी रूट पर पीछे चल रही ट्रेनों में आरक्षण करवाकर सीट मिलने के
इन्तेजार में बैठे लोग उस ट्रेन में खड़े होकर सफ़र करने पर मजबूर थे| इसकी
साफ़ वजह थी की उन लोगों ने अपना आरक्षण साधारण ट्रेन में कराया था|
बेमतलबी तरीके से सोचने वाली रेलवे जैसी संस्था अगर चाहती तो साधारण
ट्रेन में प्रतीक्षा सूची में दर्ज लोगो को खाली दौड़ती गतिमान और महामना
ट्रेन में सफर कराकर शून्य रुपए की जगह कुछ राजस्व जरुर हासिल कर सकती
थी, परन्तु ऐसा हुआ नही|
रेलमंत्री को टैग कर रोज बढ़ते ट्विटर पर शिकायतों के मामले ये बताने के
लिए काफी है कि रेलवे में खान पान के तय रेट से, दो से तीन गुना वसूली आम
बात है| गंदगी, टीटी द्वारा अनाधिकृत रूप से चढ़े लोगो को सीटें बेचने की
शिकायतें आम हो गयी है| अभी रेलवे को अपने इसी बसे पर काम करना होगा|
रेलवे के लिए केवल इतना कहना चाहूँगा की “अभी दिल्ली बहुत दूर है”|
रेलवे में डिरेलमेंट की ख़बरें जैसे आम हो गयी हैं| रेलकर्मी ही खुद बताते
हैं कि मटेरियल की कमी के कारण उन्हें गाड़ियों को अनसेफ या भगवान् भरोसे
भेजना पड़ता है. वह ये भी बताते है की कई बार मेंटीनेन्स के लिए आये हुए
किसी कोच के कलपुर्जे निकालकर दुसरे कोच में लगाकर उसे फिट करके भेजना
पड़ता है| ऐसी स्थिति तब है जब एक “स्टोरकीपर” (चेयरमैन, रेलवे बोर्ड) खुद
लगभग पिछले ढाई सालो से भारतीय रेल के शीर्ष पर है| यही नही रेलवे स्टोर
की खरीद में सालाना पांच हजार करोड़ के हो रहे भ्रष्टाचार की जांनकारी भी
उन्हें है| पर उनका मौन रहना कुछ और बयाँ करता है| कुलमिलाकर रेलवे को
अपनी पटरी पर चलने के लिए अभी काफी मशक्कत करनी होगी| खासकर यात्रियों की
बेसिक जरूरतों के लिए|
अपूर्व बाजपेयी
शाहजहांपुर 7897211842
की कहीं न कहीं मानको की अनदेखी जरुर की जा रही है| ऐसा इसलिए और साफ
होता है की जब देश का प्रधान सेवक देश में हाई स्पीड “बुलेट ट्रेन” चलाने
की बात करता है अथवा सोचता है उसी समय हमारे देश की ट्रेने जोकि पुराने
ढर्रे पर चल रही है(एक्सप्रेस एवं पैसेंजर) वही दुर्घटनाग्रस्त हो रही
है| पिछले १ साल की ही अगर हम बात करें तो कानपुर में हुआ रेल हादसा ये
बताने के लिए काफी था की रेलवे किसके भरोसे चल रहा है| हादसे होने के बाद
जागे अधिकारी मुआवजों का एलान कर बात पर पर्दा डालने की तयारी में जुट
जाते है| भारत एक विकासशील देश है यहाँ प्रतिदिन लोगो की भीड़ बढ़ ही रही
है| रेलवे को ये समझना ही होगा की रेलवे में यात्रा करने वाला ६० प्रतिशत
भारतीय मध्यम वर्ग का होता है, वो मध्यम वर्ग का आदमी कहाँ से बुलेट
ट्रेन का हाई किराया भर पायेगा|
रेलवे में बढ़ रही भीड़ का एक कारण ये भी है कि अभी हाल ही में देखा
गया की गतिमान जैसी सेमी हाई स्पीड ट्रेन के डिब्बे आधे से भी खाली गये,
जबकि उसी रूट पर पीछे चल रही ट्रेनों में आरक्षण करवाकर सीट मिलने के
इन्तेजार में बैठे लोग उस ट्रेन में खड़े होकर सफ़र करने पर मजबूर थे| इसकी
साफ़ वजह थी की उन लोगों ने अपना आरक्षण साधारण ट्रेन में कराया था|
बेमतलबी तरीके से सोचने वाली रेलवे जैसी संस्था अगर चाहती तो साधारण
ट्रेन में प्रतीक्षा सूची में दर्ज लोगो को खाली दौड़ती गतिमान और महामना
ट्रेन में सफर कराकर शून्य रुपए की जगह कुछ राजस्व जरुर हासिल कर सकती
थी, परन्तु ऐसा हुआ नही|
रेलमंत्री को टैग कर रोज बढ़ते ट्विटर पर शिकायतों के मामले ये बताने के
लिए काफी है कि रेलवे में खान पान के तय रेट से, दो से तीन गुना वसूली आम
बात है| गंदगी, टीटी द्वारा अनाधिकृत रूप से चढ़े लोगो को सीटें बेचने की
शिकायतें आम हो गयी है| अभी रेलवे को अपने इसी बसे पर काम करना होगा|
रेलवे के लिए केवल इतना कहना चाहूँगा की “अभी दिल्ली बहुत दूर है”|
रेलवे में डिरेलमेंट की ख़बरें जैसे आम हो गयी हैं| रेलकर्मी ही खुद बताते
हैं कि मटेरियल की कमी के कारण उन्हें गाड़ियों को अनसेफ या भगवान् भरोसे
भेजना पड़ता है. वह ये भी बताते है की कई बार मेंटीनेन्स के लिए आये हुए
किसी कोच के कलपुर्जे निकालकर दुसरे कोच में लगाकर उसे फिट करके भेजना
पड़ता है| ऐसी स्थिति तब है जब एक “स्टोरकीपर” (चेयरमैन, रेलवे बोर्ड) खुद
लगभग पिछले ढाई सालो से भारतीय रेल के शीर्ष पर है| यही नही रेलवे स्टोर
की खरीद में सालाना पांच हजार करोड़ के हो रहे भ्रष्टाचार की जांनकारी भी
उन्हें है| पर उनका मौन रहना कुछ और बयाँ करता है| कुलमिलाकर रेलवे को
अपनी पटरी पर चलने के लिए अभी काफी मशक्कत करनी होगी| खासकर यात्रियों की
बेसिक जरूरतों के लिए|
अपूर्व बाजपेयी
शाहजहांपुर 7897211842
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