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अगस्त, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“अंधविश्वास की चोटी कटना बहुत जरुरी”

        बीते लगभग एक पखवाड़े से देश के अलग अलग हिस्सों से चोटी कटने की अफवाहों ने जो जोर पकड़ा, वो अभी भी बदस्तूर जारी है. चोटी कटना, उसके बाद महिलाओं को बिल्ली जैसी आकृति दिखना, इन दो चीजों की समानताएं लगभग हर घटना में पाई गयी. चोटी कटना भी एक प्रकार का अंधविश्वास है. अन्धविश्वास ने उभरते भारत के सूरज के एक हिस्से (खासकर ग्रामीण तबके ) को अपनी जद में ले रखा है. जीवन के हर पग पर विज्ञानं और तकनीक के वर्चस्व की कहानी बिखरी पड़ी है पर फिर भी कुछ लोग दकियानूसी सोच का परचम बुलंद करना चाहते हैं. अंधविश्वास का अधिकाधिक प्रमाण केवल ग्रामीण क्षेत्रों में मिलता है चूँकि अंधविश्वास फ़ैलाने वाले, जिनकी दुकाने इन्ही के सहारे टिकी हैं, ये लोग कम पढ़े लिखे लोगों को अपने जाल में फंसाकर रुपया ऐंठते हैं.          अभी कुछ साल पहले गर्मियों में खबर फैली कि भगवान की मूर्तियाँ दूध पी रही है, शाम का वक़्त था, खबर सुनते ही मंदिरों में लाइने लग गयी. इन लाइनों में पढ़े लिखे लोग भी थे. इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि वर्तमान सम...

"पत्रकारों के भेष में घूमते दलाल"

“दलाल” इस शब्द से लगभग सभी व्यक्ति परिचित होंगे और सीधी एवं  स्पष्ट भाषा में कहा जाये तो दलाल उस व्यक्ति की कहते हैं जो क्रेता एवं विक्रेता के बीच की कड़ी बनकर किसी भी सौदे को बेचने में मदद करता है और बदले में उसका कुछ प्रतिशत कमीशन लेता है, इसी स्थिति में आजकल लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारों के भेष में घूम रहे दलालों से भरा हुआ है. हालाँकि सभी को इस दायरे में नही रखा जा सकता परन्तु सच्चाई यही है कि अधिकांश लोग छोटे मोटे, पत्रिका, अखबारों का सहारा लेकर पुलिस, पब्लिक पर अपना रोब गांठते नजर आते है.         चूँकि पत्रकारों के आने जाने पर प्रदेश में हर विभाग में आम आदमी से ज्यादा छूट प्राप्त है, बस इसी बात का फायदा उठाकर ये दलाल हर जगह अपनी बात फिट करवाते नजर आते है और सरकारी कर्मचारी इन्हें मीडियाकर्मी समझकर भविष्य में होने वाले नुकसान से बचना चाहता है.         सरकार द्वारा दी जाने वाली अधिकांश योजनाओं का एक बड़ा सच ये भी है उनमे से 70 प्रतिशत अपात्र लोग पात्र घोषित कर दिए जाते है, इन्ही चीज़ों के कारण ग्रामीण ...