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“अंधविश्वास की चोटी कटना बहुत जरुरी”




        बीते लगभग एक पखवाड़े से देश के अलग अलग हिस्सों से चोटी कटने की अफवाहों ने जो जोर पकड़ा, वो अभी भी बदस्तूर जारी है. चोटी कटना, उसके बाद महिलाओं को बिल्ली जैसी आकृति दिखना, इन दो चीजों की समानताएं लगभग हर घटना में पाई गयी. चोटी कटना भी एक प्रकार का अंधविश्वास है. अन्धविश्वास ने उभरते भारत के सूरज के एक हिस्से (खासकर ग्रामीण तबके ) को अपनी जद में ले रखा है. जीवन के हर पग पर विज्ञानं और तकनीक के वर्चस्व की कहानी बिखरी पड़ी है पर फिर भी कुछ लोग दकियानूसी सोच का परचम बुलंद करना चाहते हैं. अंधविश्वास का अधिकाधिक प्रमाण केवल ग्रामीण क्षेत्रों में मिलता है चूँकि अंधविश्वास फ़ैलाने वाले, जिनकी दुकाने इन्ही के सहारे टिकी हैं, ये लोग कम पढ़े लिखे लोगों को अपने जाल में फंसाकर रुपया ऐंठते हैं.
         अभी कुछ साल पहले गर्मियों में खबर फैली कि भगवान की मूर्तियाँ दूध पी रही है, शाम का वक़्त था, खबर सुनते ही मंदिरों में लाइने लग गयी. इन लाइनों में पढ़े लिखे लोग भी थे. इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि वर्तमान समाज धार्मिक ढोंग, पाखंड और अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है. लेकिन धर्म और आस्था के नाम पर पढ़े लिखे लोग भी इसका शिकार होते हैं. कहने का तात्पर्य ये है कि अन्धविश्वास को धार्मिकता से जोड़कर किसी को भी इसके प्रभाव में लाया जा सकता है. वहीँ इसके इतर जांच के दौरान यह पाया गया कि भीषण गर्मी के चलते पत्थर की मूर्ति दूध जैसे द्रव्य का स्पर्श होते ही मूर्ति ने उसे सोख लिया था. पर लोग अंधश्रधा में डूबे हजारों लीटर दूध बर्बाद करने पर तुले थे.
       21 वी सदी में आगे बढ़ते भारत का यह एक भयानक सत्य है “अंधविश्वास”. वर्षो पहले “मुह नोचवा” जैसी घटना ने भी पूरे माह अपना डंका बजाया और उससे पहले “मंकी मैन”. इन दोनों घटनाओं  में कोई भी अपराधी नही पकड़ा गया. इस तरीके की घटनाएँ केवल एक प्रकार की सनक है जो व्यक्ति अपने दिमाग में बैठा लेता है. जहाँ एक ओर हिंदुस्तान में चाँद पर पहुँचने की तैयारी हो रही है वहीँ हिंदुस्तान का एक तबका इस प्रकार के अंधविश्वासों पर विश्वास कर रहा है. प्रगतिशील और वैज्ञानिक प्रकाश से आलोकित देशों में भी किसी न किसी तरह के अंधविश्वास प्रचलित हैं. जिन सभी कार्यों को भाग्य, अवसर, टोना-टोटका के ऊपर निर्भर रहकर किया जाता है वे सभी अंधविश्वास की श्रेणी में आते है. देश के कोने कोने में आंशिक रूप से अंधविश्वास प्रचलित है क्यूंकि मनुष्य अपने भाग्य पर अपने सारे झंझटो को छोड़कर मुक्त हो जाना चाहता है. दुर्भाग्य से पूरे हिंदुस्तान का अधिकांश व्यक्ति जादू टोना, तंत्र मंत्र पर पूर्ण विश्वास रखते है और इन विश्वासों की नीव इतनी गहरी है कि इन्हें उखाड़ना भी आसान नही है.
अशिक्षितो को दरकिनार कर अच्छे अच्छे पढ़े लिखे लोगों के मस्तिष्क में भी अंधविश्वास का घर हो गया है और आश्चर्यजनक बात यह है की अंधविश्वासो में उन्हें कभी कभी भारी लाभ हो जाता है, बस यहीं से अंधविश्वास पर पूर्ण विस्वास की कहानी का शुभारम्भ हो जाता है.    
       भारत में अंधविश्वासो की वृद्धि का एक बड़ा कारण वैज्ञानिक ज्ञान का अभाव एवं सोशल मीडिया का प्रभाव है. चोटी कटने की एक मात्र अफवाह ने सोशल मीडिया के संपर्क में आते ही चिंगारी से आग लगने का काम किया. समाज में अंधविश्वास का पैर पसारने का एक और कारण व्यक्ति द्वारा बिना कुछ जांचे, किसी की भी बात पर को मानना है. किसी की भी सुनी सुनाई बातो पर विश्वास हम खुद इस तरीके के अंधविश्वास को बढ़ावा देते है.
       ये भी ध्यान देने वाली बात है की अफवाहों का दौर चाहे मुह नोचवा अथवा चोटी कटने के रूप में हो, ये अधिकतर घटनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में एवं बिजली की कटौती के समय गर्मियों में ही घटित हुई है. प्राचीन काल से भारत विज्ञान के क्षेत्र में आगे रहा है, भारत में आर्यभट्ट और भास्कर जैसे वैज्ञानिक पैदा हुए. दुनिया के कई देश तकनीक और विज्ञानं में भारत से कहीं आगे निकल गये पर भारत अंधविश्वास का शिकार बनता गया. अंधविश्वास का दोषी हमारा भटका हुआ समाज भी है जो किरदार की जगह चमत्कारों से भगवान को पहचानने की गलती किया करता है . कल का चमत्कार हकीक़त में आज का विज्ञानं है यह बात हर पढ़े लिखे को समझनी चाहिए तभी इस अंधविश्वास नामक विभीषिका से बचा जा सकेगा.


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