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मेरी कुमाऊं यात्रा

भारत में कश्मीर को धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है लेकिन कश्मीर के अलावा अगर आप उत्तराखंड की पहाड़ियों को देखेंगे या उनकी खूबसूरती को महसूस करेंगे तो पाएंगे कि उत्तराखंड भी किसी स्वर्ग से कम नहीं है। पेश है उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर से अभी हाल ही में अगस्त माह में मित्र शोभित के साथ की गई उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की बाइक यात्रा का वृतांत। उत्तराखंड वैसे ही अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है लेकिन बारिश के बाद पहाड़ों पर जो खूबसूरती और हरियाली देखने को मिलती है वह वाकई में मन मोह लेती है। उत्तराखंड राज्य में दो मंडल है एक कुमाऊं दूसरा गढ़वाल । कुमाऊं मंडल में 6 जबकि गढ़वाल मंडल में 7 जिले आते है। मैदानी इलाकों के बीच में बसा हुआ हमारा शहर शाहजहांपुर जो अगस्त में 40 से 42 डिग्री के बीच में तप रहा था उसी समय मेरी बात फोन पर मेरे मित्र शोभित से हुई, उसके द्वारा भी अपनी इच्छा कहीं घूमने की जताई गई। फाइनल हुआ कि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण किया जाएगा। चूंकि तीन दिन की छुट्टी ऑफिस से, वो भी घूमने के लिए मिलना ...

“लोक लुभावन वादों का दौर”

       लोकसभा चुनाव का प्रथम चरण संपन्न हो चुका है, प्रथम चरण के लिए विभिन्न पार्टियों द्वारा विभिन्न राज्यों में नियुक्त किये गये स्टार प्रचारक अब दूसरे राज्यों की ओर रुख कर चुके हैं ताकि जनता को फिर एक बार बहलाया और उलझाया जा सके, ऐसे वादों के झांसे में, जो शायद कभी समय पर पूर्ण नही हो पाएंगे.        चुनाव चालों और दिमागी कसरत का युद्ध है, यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे जिसके हाथ में बंदूक होती है, जीत उसी की होती है, ठीक उसी प्रकार चुनाव में प्रत्याशी की जीत उसके प्रचार और प्रचार के दौरान किये जाने वाले बड़े बड़े वादों से होती है. वर्तमान परिवेश के राजनीतिज्ञ यह भलीभांति समझ चुके है कि वह जनता के हर वर्ग को कभी संतुष्ट नही कर सकते हैं, इसीलिए जनता के बहुसंख्यक वर्ग की समस्याओ पर अपना ध्यान आकर्षित करते हैं, बड़े बड़े वादे कर वह उस वर्ग को अपने पक्ष में करने की जुगत में रहते है जो आसानी से उनके झूठे वादों पर विश्वास कर लें.         देश के राजनीतिक दलों में चुनावी वादे करते समय मुफ्त परियोजनाओ...

“परिवारवाद की राजनीति में हुआ नये चेहरे का पदार्पण”

    भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक कांग्रेस ने बुधवार दोपहर जब प्रियंका गाँधी वाड्रा को महासचिव बनाने के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया तो कांग्रेस समर्थको में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी, इसी के साथ इस कथन पर भी मुहर लग गयी कि “भारत की राजनीती में परिवारवाद” हमेशा की तरह हावी रहेगा, फिर चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल में ही क्यों न हो.     वंशवाद अथवा परिवारवाद सत्ता के शासन की वह प्रणाली है जिसमे एक ही परिवार, वंश से एक के बाद एक कई शासक बनते जाते है. भाईभतीजावाद का जनक इसका ही एक रूप है. ऐसा माना जाता है कि लोकतंत्र में परिवारवाद के लिए कोई स्थान नही है, परन्तु यह फिर भी हावी है.     भारत में हर चुनाव से पहले लगभग हर राजनीतिक दल का एक दूसरे पर भाषणों के द्वारा किये जाने वाले हमलों का प्रमुख मुद्दा परिवारवाद एवं वंशवाद ही होता है, फिर चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो या समाजवादी पार्टी. एक दूसरे राजनीतिक दलों पर परिवारवाद का लांछन लगाने वाले नेता अपनी ही पार्टी के अन्दर अपने ही बेटे बेटियों का मंत्री, विधायक, सांसद बनना ...