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“लोक लुभावन वादों का दौर”


       लोकसभा चुनाव का प्रथम चरण संपन्न हो चुका है, प्रथम चरण के लिए विभिन्न पार्टियों द्वारा विभिन्न राज्यों में नियुक्त किये गये स्टार प्रचारक अब दूसरे राज्यों की ओर रुख कर चुके हैं ताकि जनता को फिर एक बार बहलाया और उलझाया जा सके, ऐसे वादों के झांसे में, जो शायद कभी समय पर पूर्ण नही हो पाएंगे.
       चुनाव चालों और दिमागी कसरत का युद्ध है, यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे जिसके हाथ में बंदूक होती है, जीत उसी की होती है, ठीक उसी प्रकार चुनाव में प्रत्याशी की जीत उसके प्रचार और प्रचार के दौरान किये जाने वाले बड़े बड़े वादों से होती है. वर्तमान परिवेश के राजनीतिज्ञ यह भलीभांति समझ चुके है कि वह जनता के हर वर्ग को कभी संतुष्ट नही कर सकते हैं, इसीलिए जनता के बहुसंख्यक वर्ग की समस्याओ पर अपना ध्यान आकर्षित करते हैं, बड़े बड़े वादे कर वह उस वर्ग को अपने पक्ष में करने की जुगत में रहते है जो आसानी से उनके झूठे वादों पर विश्वास कर लें.
        देश के राजनीतिक दलों में चुनावी वादे करते समय मुफ्त परियोजनाओं का प्रलोभन देने का दौर भी पिछले चुनावों में देखा जा चुका है, ये रंगीन टीवी, लैपटॉप, स्कूटी यहाँ तक कि मंगलसूत्र देने तक के वायदे कर डालते है, उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली अथवा बिहार, कहानी सबकी एक जैसी है.
         एक राष्ट्रीय पार्टी द्वारा अपने संकल्प पत्र में संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने का वादा किया गया है, बदले में दूसरी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा सत्ता में वापसी पर 72000 रूपए सालाना पांच करोड़ गरीब परिवारों को देने का वायदा किया गया है. भारत में वादों की राजनीती काफी पुरानी है, वो बात अलग है कि सत्ता पाने के बाद कितनी पार्टियाँ वादों को हकीकत में बदल पाती है. आम जनता के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों और राजनीती में अपराध तथा भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव का बेहद अभाव है, विभिन्न दलों के घोषणा पत्रों पर नज़र डालें तो आप पायेंगे कि राजनीतिक दल और उसके नेता अक्सर जनता से पानी, बिजली, सड़क और वर्तमान में सबकी जुबां पर चढ़ चुका “रोजगार” का वादा करते देखे जाते है लेकिन वो यह नही बताते कि सत्ता में आने के बाद इन वादों को किस तरह अमल में लायेंगे.
        उदाहरण के तौर पर भ्रष्टाचार नामक मुद्दे को ही ले लें, लगभग हर राजनीतिक दल के घोषणापत्रों में “भ्रष्टाचार” मिटाने/खत्म करने का मुद्दा प्रमुख रहता है. सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार मिटाने की बातें बहुत अच्छी लगती है और कई बार इससे यह उम्मीद भी पैदा होती है कि पूरा नहीं तो थोडा ही सही, भ्रष्टाचार में कमी आयेगी .गरीबो और वंचितों तबके की सहायता के लिए चलाई जा रही ढेरों केंद्रीय परियोजनायें हैं लेकिन इन परियोजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने को लेकर हमेशा शिकायत आती रहती है, जन वितरण प्रणाली, मनरेगा, बैंक का लोन चुकाने में घूस लेने की खबरें आम हो चुकी है, समय की मांग है कि आम आदमी को त्वरित और प्रभावी सेवा मिल सके, लेकिन राजनीतिक दलों के पास न तो इस जनता के लिए समय है और न ही कोई तरीका है जिससे जनता की इन जमीनी दिक्कतों का हल निकल सके.
         आमतौर पर हमारे यहाँ मतदाता नकारात्मक मतदान करता है यानि जो उसको पसंद नही उसके खिलाफ मतदान करता है. बहुत कम राजनीतिक दल ऐसे होते है जिनको पचास फीसदी से अधिक मत हासिल होते है, लोक लुभावन वादे अथवा घोषणाएं राजनीतिक दलों के लिये एक बार मुफीद हो सकती है पर अगर यह धरातल पर सामने नही आयी तो जनता इन राजनीतिज्ञों को सबक सिखाने में पीछे भी नही रहती. सत्ताधीश नेताओ से अपेक्षा रहती है कि वे विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करें. सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए बड़े बजट की आवश्यकता होती है. लोकलुभावन या यूँ कहें मुफ्तखोरी वाली घोषणाओं पर अमल को प्राथमिकता दी गयी तो समग्र विकास की उम्मीदें काफी कम हो जाती हैं. जनता कितनी भी मुफ्त की घोषणाओं का फायदा उठा लें लेकिन उसकी भरपाई परोक्ष करारोपण से ही होती है. इस बात का अहसास जनता को बिक्री कर व अन्य उपकर लगते समय जनता को होता ही नही है, कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यही है कि महंगाई का सामना उसी जनता को करना पड़ता है, जिसके लिए ये लोकलुभावन वादे किये जाते हैं. 
         भारत के सभी राजनैतिक दल इसी प्रकार अनेक वायदे जनता से करते है, वे रोजगार देने, गरीबी हटाने, किसानों की स्थिति सुधारने के वचन देते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य अपना कार्यकाल पूरा करना होता है, जनता अपनी आशाओ के पूरा होने की ख़ुशी में अपनी वर्तमान स्थिति को भूल जाती है, पांच साल तक कुर्सी पर जमे रहने के बाद जनता के प्रतिनिधि, जनता के ही वादों को भूल जाते हैं, जनता एक बार फिर ठगी जाती है. पुनः चुनाव का एलान होता है, एक बार फिर नया चेहरा  जनता के द्वार पर आता है, वो फिर से अपने “वादों की झड़ी” लगाता है, जनता फिर अपना प्रतिनिधि चुनती है, यही क्रम बदस्तूर जारी है......


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