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“निर्मल होने की आस में मोक्षदायिनी गंगा”

       “गंगा” अपने आप में एक अलग संसार को समेटे हुए है. कोई इसे माँ मानता है तो कोई मोक्षदायिनी. हजारो सालों से अनवरत बहती हुई इस नदी पर देश के लाखो लोग निर्भर हैं, उनकी निर्भरता किसी भी रूप में हो सकती है, फिर चाहे वो खेती करने वाले किसान के रूप में हो अथवा पूजा करने वाले विद्वान की. गंगोत्री से निकलकर हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करके लाखो लोगो के जीवन यापन का साधन बनकर बंगाल तक जाने वाली गंगा आज अपनी स्वछता पर आंसू बहा रही है, और इसका सबसे बड़ा कारन जल प्रदुषण है. आज गंगा के प्रदूषित होने का कारण हमारी आस्था के नाम पर हर प्रकार के पूजा के सामानों को गंगा में प्रवाहित करना भी है. फक्ट्रियों से निकलने वाला कूड़ा, नालों से बहती गंदगी की धारे भी उतना ही योगदान कर रही है जितनी हम आस्था के नाम पर गंदगी फैला करके कर रहे है.        गंगा आज उदास है क्यूंकि माँ का दर्जा मिलने के बाद भी स्वछता/निर्मलता अभी भी उससे कोसो दूर है. गंगा आज उदास है क्यूंकि सरकारों को उसकी याद केवल उसके तटों पर होने वाले आयोजनों पर ही आती है. गंगा आज उदास है क...