“गंगा” अपने आप में एक अलग संसार को समेटे
हुए है. कोई इसे माँ मानता है तो कोई मोक्षदायिनी. हजारो सालों से अनवरत बहती हुई
इस नदी पर देश के लाखो लोग निर्भर हैं, उनकी निर्भरता किसी भी रूप में हो सकती है,
फिर चाहे वो खेती करने वाले किसान के रूप में हो अथवा पूजा करने वाले विद्वान की.
गंगोत्री से निकलकर हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करके लाखो लोगो के जीवन यापन का
साधन बनकर बंगाल तक जाने वाली गंगा आज अपनी स्वछता पर आंसू बहा रही है, और इसका
सबसे बड़ा कारन जल प्रदुषण है. आज गंगा के प्रदूषित होने का कारण हमारी आस्था के
नाम पर हर प्रकार के पूजा के सामानों को गंगा में प्रवाहित करना भी है. फक्ट्रियों
से निकलने वाला कूड़ा, नालों से बहती गंदगी की धारे भी उतना ही योगदान कर रही है
जितनी हम आस्था के नाम पर गंदगी फैला करके कर रहे है.
गंगा आज उदास है क्यूंकि माँ का दर्जा
मिलने के बाद भी स्वछता/निर्मलता अभी भी उससे कोसो दूर है. गंगा आज उदास है
क्यूंकि सरकारों को उसकी याद केवल उसके तटों पर होने वाले आयोजनों पर ही आती है.
गंगा आज उदास है क्यूंकि उद्गम स्थल से हरिद्वार तक निर्मल रहने वाला इसका जल मलिन
हो जाता है.
इसकी मलिनता मानवीय गतिविधियों की उपज है. एक
नदी जो हमारी पहचान है, हमारी पुरानी सभ्यता का प्रतीक है वह अपनी अस्मिता खो रही
है.
देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने
के बाद खुद प्रधानमंत्री के ड्रीम मिशन के रूप में नमामि गंगे परियोजना को सामने
लाया गया. क्यूंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने गंगा की सफाई को काफी समर्थन
दिया था. मोदी का ड्रीम मिशन होने के बाद भी इस परियोजना का पिछले तीन सालों में
कोई खास असर देखने को नही मिला. वहीँ जब
कोर्ट ने केंद्र सरकार से तल्ख़ लहजे में पूछा तो सरकार ने परियोजना की अवधि 18
वर्ष और लोगों में जागरूकता फ़ैलाने का काम परियोजना में आने वाली राज्य सरकारों पर
डालकर अपना पल्ला झड लिया.
गंगा केवल नदी ही नही एक संस्कृति भी है.
करोडो पशु पक्षी इसके जल पर निर्भर है. गंगा पर फरक्का आदि कई बांध बनाकर बड़ी बड़ी
परियोजनाएं लागू की गयी हैं. गंगा नदी विश्व भर में अपनी शुद्धिकरण क्षमता के कारण
जानी जाती है. लम्बे समय से प्रचलित इसकी शुद्धिकरण का वैज्ञानिक आधार भी है.
वैज्ञानिको ने तक माना कि केवल गंगा के जल में ही बैक्टीरिया फेज नामक विषाणु है
जो जीवाणुओं व् अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवो को जीवित नही रहने देते है. लेकिन पिछले
कुछ वर्षों में सरकार ने नए नए उद्योगों को लगाने के लिए कानूनों में ढील दी तो
उल्टा उद्योग मालिको ने कानूनों को तक पर रखकर अपने उद्योगों का गन्दा पानी सीधे
गंगा में ही बहाना शुरू कर दिया. औद्योगिक कचरे के साथ साथ प्लास्टिक कचरे ने भी
गंगा को काफी प्रदूषित किया है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश
की 12 प्रतिशत बीमारियों की मुख्य वजह प्रदूषित गंगा जल है. ये सबसे चिंतनीय है कि
गंगा जल को साफ़ करने के लिए घड़ियालो की मदद ली जा रही है, नई नई परियोजनाएं लगायी
जा रही हैं, यहाँ तक की वर्तमान सरकार ने 2014 में सरकार बनने के बाद अलग मंत्रालय
तक गठित कर दिया पर अफ़सोस की बात ये है की इतना सब करने के बाद भी गंगा के
अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे है.
सरकार को असली ध्यान लोगो में जागरूकता
फ़ैलाने पर देना होगा ताकि आस्था, धर्म, कर्म के नाम पर गंगा को प्रदूषित करने से
रोका जा सके वरना वो दिन दूर नही जब गंगा भी इतिहास की पुस्तकों में दर्ज हो
जाएगी.
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