भारत के लगभग सभी प्रदेश बाढ़ नामक शब्द से भलीभांति परिचित है.
हालाँकि इसे सीधे तौर पर बाढ़ कहना गलत ही होगा , आसमान से तो केवल पानी
की बूंदें बरसती है पर यहाँ धरती पर सरकार की नाकामी, बदइन्तजामी उसे बाढ़
का रूप दे देती है. बाढ़ से देश के सभी राज्य लगभग परिचित और पीड़ित हैं.
हर साल बाढ़ आने के बाबजूद इससे होने वाली मौतों और जनहानि में लगातार
इजाफा ही हुआ है. यही चीज़ यहाँ सरकारों के ऊपर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है
कि आखिर समस्या की जानकारी होने के बाबजूद उसके निराकरण का पूर्ण प्रयास
नही किया गया. आजकल देश का एक हिस्सा असम बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित
है.
सरकार की तरफ से अपने कार्यालय में एसी में बैठकर मीडिया और
चैनलों को बाईट में यह कहना कि “सरकार हर तरीके के कार्य में प्रतिबद्ध
है एवं बाढ़ से ग्रसित लोगों की शिविरों में नियमित रूप से देखभाल हो रही
है” नामक बड़े बड़े बयान देना तो आसान है, पर हकीक़त इससे कोसों दूर है. असम
के स्थानीय लोगो के मुताबिक व्यक्तियों एवं मवेशियों को एक ही स्थान पर
और एक ही समय खाना उपलब्ध कराया जाना सरकार की हीलाहवाली को दर्शाता है.
देश के तीन हिस्सों असम, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल लगभग हर तीसरे साल
बाढ़ से पीड़ित रहते है. लोगो के लिए इतना आसान नही होता, अपनी जमीन, घर ,
मवेशी को छोड़कर राहत शिविरों में रह पाना. सरकारे बाढ़ के प्रति कितना
गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की सीएजी की एक
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वर्ष 2009 से वर्ष 2014 तक केंद्र
सरकार द्वारा बाढ़ राहत के रूप में 3300 करोड़ रुपया जारी किया गया परन्तु
इस धनराशी का केवल 60 प्रतिशत उपयोग ही किया गया और 40 प्रतिशत की धनराशी
वापस कर दी गयी. वहीँ इन सबके इतर 2009 से वर्ष 2014 तक बाढ़ से मरने
वालों की संख्या कई सौ का ग्राफ पार कर चुकी थी. सरकारों की यह उदासीनता
बयाँ कर रही है कि बाढ़ जैसे खतरे के प्रति वेह कितनी जागरूक है. वर्तमान
में बाढ़ से उत्तर प्रदेश भी अछुता नही है, इसकी शुरुआत गोंडा जिले में
नेपाल से छोड़े जाने वाल पानी से हो चुकी है. हर साल की तरह नेपाल से इस
साल भी बिना बताये लाखों क्यूसेक पानी नदियों में छोड़ दिया गया. इतना
गंभीर विषय होने के बाद भी सरकार द्वारा मौन रहना सवाल खड़े करता है कि
क्यूँ सरकार द्वारा पूरे साल में दो तीन बार एक कमेटी गठित कर नेपाल के
किसी प्रतिनिधि मंडल से मिलकर इस समस्या का कोई हल निकाला जाये, अथवा
नेपाल की ओर से छोड़े जाने वाले पानी पर विस्तृत चर्चा की जाये.
जल ही जीवन है, यह तो पूर्णतया सत्य है परन्तु जिस प्रकार
से किसी भी वस्तु की अति या आवश्यकता से अधिक की प्राप्ति हानिकारक है,
उसी प्रकार जल की अधिकता अर्थात बाढ़ भी प्रकति का प्रकोप बनकर सामने आती
है जो अपने साथ बहुमूल्य संपत्ति, और जीवन दोनों को समेटकर ले जाती है.
प्रत्येक वर्ष बाढ़ के समय हमारे नेतागण व् प्रसाशन सजग दिखाई देता है, बस
फिर शुरू होती है बचाने की जद्दोजेहद. एक बार फिर कुछ दिनों बाद ये नेता
और प्रसाशन इस घटना को सामान्य सा समझ दुसरे कार्यों में व्यस्त हो जाते
है. स्वतंत्रता के लगभग 60 वर्षों के बाद भी हम इस समस्या का कोई स्थायी
समाधान नही निकाल सके, ये वाकई में शर्मनाक है.
सरकार को ये समझना होगा की गंगा, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र, गोमती आदि नदियाँ
एक ओर तो मनुष्य के लिए वरदान हैं वहीँ दूसरी ओर कभी कभी प्रकोप बनकर
अभिशाप भी बन जाती है. इस प्रकार के पहलुओं पर सरकार को दीर्घकालिक
हालाँकि इसे सीधे तौर पर बाढ़ कहना गलत ही होगा , आसमान से तो केवल पानी
की बूंदें बरसती है पर यहाँ धरती पर सरकार की नाकामी, बदइन्तजामी उसे बाढ़
का रूप दे देती है. बाढ़ से देश के सभी राज्य लगभग परिचित और पीड़ित हैं.
हर साल बाढ़ आने के बाबजूद इससे होने वाली मौतों और जनहानि में लगातार
इजाफा ही हुआ है. यही चीज़ यहाँ सरकारों के ऊपर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है
कि आखिर समस्या की जानकारी होने के बाबजूद उसके निराकरण का पूर्ण प्रयास
नही किया गया. आजकल देश का एक हिस्सा असम बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित
है.
सरकार की तरफ से अपने कार्यालय में एसी में बैठकर मीडिया और
चैनलों को बाईट में यह कहना कि “सरकार हर तरीके के कार्य में प्रतिबद्ध
है एवं बाढ़ से ग्रसित लोगों की शिविरों में नियमित रूप से देखभाल हो रही
है” नामक बड़े बड़े बयान देना तो आसान है, पर हकीक़त इससे कोसों दूर है. असम
के स्थानीय लोगो के मुताबिक व्यक्तियों एवं मवेशियों को एक ही स्थान पर
और एक ही समय खाना उपलब्ध कराया जाना सरकार की हीलाहवाली को दर्शाता है.
देश के तीन हिस्सों असम, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल लगभग हर तीसरे साल
बाढ़ से पीड़ित रहते है. लोगो के लिए इतना आसान नही होता, अपनी जमीन, घर ,
मवेशी को छोड़कर राहत शिविरों में रह पाना. सरकारे बाढ़ के प्रति कितना
गंभीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की सीएजी की एक
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वर्ष 2009 से वर्ष 2014 तक केंद्र
सरकार द्वारा बाढ़ राहत के रूप में 3300 करोड़ रुपया जारी किया गया परन्तु
इस धनराशी का केवल 60 प्रतिशत उपयोग ही किया गया और 40 प्रतिशत की धनराशी
वापस कर दी गयी. वहीँ इन सबके इतर 2009 से वर्ष 2014 तक बाढ़ से मरने
वालों की संख्या कई सौ का ग्राफ पार कर चुकी थी. सरकारों की यह उदासीनता
बयाँ कर रही है कि बाढ़ जैसे खतरे के प्रति वेह कितनी जागरूक है. वर्तमान
में बाढ़ से उत्तर प्रदेश भी अछुता नही है, इसकी शुरुआत गोंडा जिले में
नेपाल से छोड़े जाने वाल पानी से हो चुकी है. हर साल की तरह नेपाल से इस
साल भी बिना बताये लाखों क्यूसेक पानी नदियों में छोड़ दिया गया. इतना
गंभीर विषय होने के बाद भी सरकार द्वारा मौन रहना सवाल खड़े करता है कि
क्यूँ सरकार द्वारा पूरे साल में दो तीन बार एक कमेटी गठित कर नेपाल के
किसी प्रतिनिधि मंडल से मिलकर इस समस्या का कोई हल निकाला जाये, अथवा
नेपाल की ओर से छोड़े जाने वाले पानी पर विस्तृत चर्चा की जाये.
जल ही जीवन है, यह तो पूर्णतया सत्य है परन्तु जिस प्रकार
से किसी भी वस्तु की अति या आवश्यकता से अधिक की प्राप्ति हानिकारक है,
उसी प्रकार जल की अधिकता अर्थात बाढ़ भी प्रकति का प्रकोप बनकर सामने आती
है जो अपने साथ बहुमूल्य संपत्ति, और जीवन दोनों को समेटकर ले जाती है.
प्रत्येक वर्ष बाढ़ के समय हमारे नेतागण व् प्रसाशन सजग दिखाई देता है, बस
फिर शुरू होती है बचाने की जद्दोजेहद. एक बार फिर कुछ दिनों बाद ये नेता
और प्रसाशन इस घटना को सामान्य सा समझ दुसरे कार्यों में व्यस्त हो जाते
है. स्वतंत्रता के लगभग 60 वर्षों के बाद भी हम इस समस्या का कोई स्थायी
समाधान नही निकाल सके, ये वाकई में शर्मनाक है.
सरकार को ये समझना होगा की गंगा, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र, गोमती आदि नदियाँ
एक ओर तो मनुष्य के लिए वरदान हैं वहीँ दूसरी ओर कभी कभी प्रकोप बनकर
अभिशाप भी बन जाती है. इस प्रकार के पहलुओं पर सरकार को दीर्घकालिक
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