पिछले
वर्ष 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान किया उससे ठीक पहले आम लोगो
को यही लगा था कि शायद प्रधानमंत्री मोदी भारत पाकिस्तान के कड़वे रिश्तों पर कुछ
ठोस निर्णय लेंगे. पर नोटबंदी जैसी घोषणा आम लोगो के लिए युद्ध के ऐलान से भी
ज्यादा घातक सिद्ध हुई. आने वाली 8 नवंबर को भारत में नोटबंदी हुए पूरा एक वर्ष
बीत जायेगा. इस पूरे वर्ष के दौरान “नोटबंदी” नामक मुद्दे ने भारत में खूब
सुर्खियाँ बटोरी हैं. फिर वो चाहे न्यूज़ चैनलों पर होने वाली डिबेट हों अथवा
चुनावी जनसभाओं में आरोप प्रत्यारोप.
हालाँकि इस नोटबंदी का बड़े शहरो की
अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नही पड़ा लेकिन छोटे शहरों ने थोड़ी दिक्कतों का सामना
जरुर किया क्यूंकि बड़े शहरो के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा डिजिटल पेमेंट
का रास्ता अपना लिया, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ जनता को स्मार्टफ़ोन से
साधारण मैसेज भेजने में भी दिक्कत हो, वहां सारा व्यापार, लेनदेन डिजिटल माध्यम से
करना एक सपना ही लगता है.
इन्ही
मुद्दों को द्रष्टिगत रखते हुए जहाँ सरकार इसका जश्न मनाने की तैयारी में लगी है
वहीँ विपक्ष इसको चुनावी मुद्दा बनाकर “काला दिवस” मनाकर लोगो का ध्यान अपनी तरफ
आकर्षित करने में लगा है.
आजादी की लड़ाई के बाद सम्भवतः नोटबंदी ही
एक ऐसा साहसिक कदम था, जिसमे समूचा भारत व्यापक स्तर पर प्रभावित हुआ है. अगर
सरकार की तरफ से इसके सकारात्मक नजरिये से देखें तो नोटबंदी के कारण देश में बड़ी
संख्या में लोग बैंकिंग सेवा की ओर मुड़े, और तो और देश की लगभग आधी आबादी यानि
महिलाओं के कदम बैंको की ओर बढ़े. अगर इसके एनी लाभों को द्रष्टिगत रखा जाये तो
आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड की फंडिंग को भी एक बारगी नोटबंदी के कारण ही झटका लगा था.
हालाँकि इन सबसे इतर देश के सबसे बड़े मुद्दे काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर
जिस कंट्रोल की बात सामने आयी थी,इस बात पर अभी भी काफी बढ़ा विवाद है. वहीँ
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के इरादे से की गयी नोटबंदी का कितना असर देखने को
मिला, यह भी अभी पूरी तरह से स्पष्ट नही है.
वहीँ नोटबंदी के दिवस पर कालादिवस मनाने
की घोषणा करने वाले विपक्षी दलों की दलीलों पर अगर गौर किया जाये तो पूरा विपक्षी
दल पूरी एकजुटता के साथ सरकार के इस निर्णय को असफल व् देश को पीछे ले जाने वाला
सिद्ध करने में लग गया. विपक्षी दलों के द्वारा पूरे साल नोटबंदी से आम जनता को
हुई दिक्कत, व्यापारिक नुकसान जैसे मुद्दों को मोहरा बनाकर पूरे तरीके से घेरने की
कई असफल कोशिशें हुई.
पर इन सबसे इतर अगर एक आम भारतवासी के
नजरिये से गौर करें तो नोटबंदी से उसे काफी कुछ सीखने को मिला, हर घरेलू सामान की
कीमत उसे समझ में आने लगी. अमीर दोस्तों को उनके गरीब दोस्त नजर आ गये. अमीरों को
अपने गरीब रिश्तेदारों का ख्याल आ गया. हजारों लोगो के बैंक अकाउंट जो सालों से
निष्क्रिय थे, चालू हो गये. कुल मिलकर ये कहा जा सकता था कि नोटबंदी से पूरी
मानवता जिन्दा हो गयी.
विपक्ष भले ही नोटबंदी को कालादिवस मनाये
पर अगर आने वाले समय की ओर देखें तो नोटबंदी से हुई परेशानी से ही सही पर लाखों
लोगों ने “डिजिटल इंडिया “को अपनाया और सीखा. उनका सीखना चाहे मज़बूरी में रहा हो
लेकिन इसके सार्थक परिणाम भविष्य में देखने को जरुर मिलेंगे.
अपूर्व बाजपेयी
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