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“राजनीतिक जाल में फंसता किसान”



          अभी हाल ही के दिनों में एक मुद्दा पूरे देश में जोर शोर से उठकर सामने आया, नाम था “किसान आन्दोलन”| सभी राजनीतिक पार्टियों ने किसानो के साथ छल किया है, ये तो जायज है पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए विपक्ष और विपक्षी पार्टियाँ किसानो को मोहरा बना लेंगी, ये किसी ने सोचा भी न होगा|
          राजनीतिक दल द्वारा साम, काम, दंड, भेद सभी तरीके अपनाकर वोटो पर कब्ज़ा करना केवल वर्तमान की राजनीति रह गयी है| बस लालच किसी भी प्रकार का हो सकता है, चाहे वो शराब का हो या पूर्ण कर्ज माफ़ी का| परिणामस्वरुप पार्टियाँ और उनके प्रत्याशी नीतियों की बजाय सुविधाए की बातें ज्यादा करते नजर आते है| पहले चुनाव में लोक लुभावन वादे केवल दक्षिण तक ही सीमित थे परन्तु अब ये पूरे देश में फ़ैल चुके हैं| किसानो का एक बड़ा तबका भारत में है और इन्हें आसानी से अपने पाले में करना लगभग सभी पार्टियाँ अच्छे से जान चुकी है| दरअसल पूरे लोकतंत्र को सभी तरीको के लोकलुभावन नीतियों या कार्यक्रमों का एक जामा फना दिया जा चुका है| बीते माह में कई राज्यों में चुनाव प्रचार के समय किसानो को अपने पक्ष में करने के लिए कर्जमाफी का एलान किया, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री ने खुद मंचो से पहली बैठक में कर्जमाफ़ी का एलान किया, और अन्त्वोगत्वा उत्तर प्रदेश सरकार ने उस फैसले को शुरू भी किया| बस यहीं से किसान आन्दोलन का वो बीज उपजा जो अब बड़े वृक्ष के रूप में सामने आया है|
            दूसरे राज्यों महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के किसानो की उम्मीद अब जोर जबरदस्ती में तब्दील हो चुकी है| किसानो की कर्जमाफ़ी के अलावा एक और मांग जायज , जो कि 60 साल के उम्र वाले किसानो को पेंशन देनें की है, जैसा कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ अपने समर्थको को देकर धन्य हो रही है| उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले का असर केवल महाराष्ट्र में ही नही बल्कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और पंजाब तक पहुँच गयी है| हालाँकि केवल चार पांच राज्य ही कर्ज के बोझ से नही दबे है, इससे पहले तमिलनाडु के किसान भी दिल्ली में स्वमूत्र पीकर आन्दोलन कर चुके है| सरकारों को किसानो की बदहाली का अंदाजा मौजूदा समय में 12 लाख 60 हजार करोड़ के कर्ज से लगाना होगा|
         “आप किसी से भी भारत के किसान की दुर्दशा का वर्णन कीजिये तो उसके परिणाम में उसके मुह से उपेक्षा भाव से, एक धीमी “हाँ” निकलती है, और कुछ नही. बस किसानो के प्रति उनके कर्त्तव्य और सहानभूति का यहीं अंत हो जाता है”|
          अभी हाल ही में मध्यप्रदेश में हुए किसान आन्दोलन के बाद वायरल हुए विडियो में कांग्रेस की विधायक, लोगों को समझाने एवं सांत्वना देने की बजाय “थाना’ फूंक देनें की अपील करती नजर आई| ऐसी सोच बयाँ करती है कि किसानो के कंधो पर अपनी राजनीति की बंदूक चलाना कितना आसान है| सरकारों को चाहिए कि राज्यों के किसानो के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठकर एक बैठक करनी चाहिए| सरकार को ये समझना होगा कि किसान भारत के अन्नदाता है, एक किसान ही है जो कि भारत की रीढ़ है| सारी सरकारें इस बात को समझें कि अगर देश का किसान अपनी जायज मांगो को लेकर रोयेगा तो आने वाले समय में उसे इन राजनीतिक पार्टियों को उखाड़ फेंकने में जरा भी देर नही लगेगी, और वर्तमान सरकार को अन्य राज्यों में अपनी सरकार बनाने का सपना केवल एक मात्र सपना ही रह जायेगा|
वर्तमान में किसानो की ऐसी हालत देखने के बाद कवि प्रताप सोमवंशी जी की दो पंक्तियाँ याद आती है
“किसान एक ऐसी खाद है जिससे उपजी फसल सत्ता काट चुकी है, विपक्ष अपने खेत में डाल रहा है, अगली फसल लहलहाने के लिए”|



     
       

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