पिछले कुछ वर्षो से बजट का अभाव, सरकार द्वारा मदद के नाम पर सिर्फ
आश्वाशन के कारण अपनी बदहाली पर रो रही गोरखपुर की "गीता प्रेस" के अच्छे
दिन अब शायद योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से करीब
आते नजर आ रहे हैं। गीता प्रेस ने हिंदुत्व और हिन्दू धर्म का प्रचार,
प्रसार करने का जो जिम्मा बरसो पहले उठाया था वो आज तक कायम है।
गीता प्रेस ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो कि पूरे देश में अपने लाखों संस्करणों को हिंदुत्व के प्रचार, प्रसार हेतु बेचती है वो भी "उस संस्करण पर व्यय हुई धनराशि से भी कम दाम पर"। या दूसरे शब्दों में कहें तो ये धनराशि आज के जमाने में एक नाम मात्र की है। ऐसी संस्था जो कि लगभग हर घर में हर दिन उपयोग में जरुर आती है, उस संस्था को वर्तमान में गोरखपुर या प्रदेश के बड़े बड़े उद्योगपतियों से मिलने वाले दान पर निर्भर रहना पद रहा है।
"इस काल में गीता प्रेस की यह दशा वाकई पीड़ा देती है जब वर्तमान काल में संघ प्रमुख 800 साल बाद पहला हिन्दू शासन करार देते हैं"। पिछली सरकार में इस पर ध्यान क्यों नही दिया गया ये बात भी काफी आश्चर्यजनक है क्यूंकि उत्तर प्रदेश में हिन्दू मुख्यमंत्री होने के बाद भी "संस्था" में संसाधनों का अभाव ये दर्शाता है कि सरकार सिर्फ टेक्नोलॉजिकल वे पर काम करती चलती रही और धार्मिक स्थलों और धर्मो का अत्यधिक प्रचार करने वाली संस्था सिर्फ एक मजाक बन कर रह गयी।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से आई है, उस पर भी "योगी" जैसा चेहरा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है जिसे ही हिंदुत्व का रखवाला या हिन्दू वादी चेहरा कहा जाता है। इतना सब होने के बाद भी अब एक बार को जरुर लगता है की गोरखपुर के पूर्व सांसद माननीय मुख्यमंत्री जी इस संस्था की ओर अपना ध्यान जरुर आकर्षित करेंगे। गीता प्रेस के कर्मचारियों के द्वारा स्थाई नौकरी की बात पर मेरा सुझाव और तर्क ये है कि पिछली सरकार अगर शिक्षामित्रो का समायोजन कर सकती है तो फिर "प्रेस" के उन कर्मचारियों को भी स्थाई नौकरी का लाभ मिलना चाहिए अथवा मानदेय में बढ़ोत्तरी की उम्मीद की जानी चाहिए।
कुल मिलाकर आने वाले 5 वर्षो में अगर इस ओर ध्यान नही दिया गया तो फिर किसी डिबेट में किसी व्यक्ति के द्वारा मुख्यमंत्री जी से सवाल पूछने पर वे क्या जबाब देंगे क्यूंकि अब जो वर्तमान समय उत्तर प्रदेश की राजनीती का है वो "चित भी मेरी और पत भी मेरी" वाला समय है। आने वाले ढाई वर्ष में केंद्र और राज्य दोनों की सरकारे भाजपा की होने के कारण इस "गीता प्रेस" संस्था को अब अपने अच्छे दिन दिखाई पड़ने लगे हैं। बाकि उम्मीद पर तो दुनिया कायम है और संस्था तो काफी वर्षो से उम्मीदों के साये में ही जी रही है।
गीता प्रेस ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो कि पूरे देश में अपने लाखों संस्करणों को हिंदुत्व के प्रचार, प्रसार हेतु बेचती है वो भी "उस संस्करण पर व्यय हुई धनराशि से भी कम दाम पर"। या दूसरे शब्दों में कहें तो ये धनराशि आज के जमाने में एक नाम मात्र की है। ऐसी संस्था जो कि लगभग हर घर में हर दिन उपयोग में जरुर आती है, उस संस्था को वर्तमान में गोरखपुर या प्रदेश के बड़े बड़े उद्योगपतियों से मिलने वाले दान पर निर्भर रहना पद रहा है।
"इस काल में गीता प्रेस की यह दशा वाकई पीड़ा देती है जब वर्तमान काल में संघ प्रमुख 800 साल बाद पहला हिन्दू शासन करार देते हैं"। पिछली सरकार में इस पर ध्यान क्यों नही दिया गया ये बात भी काफी आश्चर्यजनक है क्यूंकि उत्तर प्रदेश में हिन्दू मुख्यमंत्री होने के बाद भी "संस्था" में संसाधनों का अभाव ये दर्शाता है कि सरकार सिर्फ टेक्नोलॉजिकल वे पर काम करती चलती रही और धार्मिक स्थलों और धर्मो का अत्यधिक प्रचार करने वाली संस्था सिर्फ एक मजाक बन कर रह गयी।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से आई है, उस पर भी "योगी" जैसा चेहरा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है जिसे ही हिंदुत्व का रखवाला या हिन्दू वादी चेहरा कहा जाता है। इतना सब होने के बाद भी अब एक बार को जरुर लगता है की गोरखपुर के पूर्व सांसद माननीय मुख्यमंत्री जी इस संस्था की ओर अपना ध्यान जरुर आकर्षित करेंगे। गीता प्रेस के कर्मचारियों के द्वारा स्थाई नौकरी की बात पर मेरा सुझाव और तर्क ये है कि पिछली सरकार अगर शिक्षामित्रो का समायोजन कर सकती है तो फिर "प्रेस" के उन कर्मचारियों को भी स्थाई नौकरी का लाभ मिलना चाहिए अथवा मानदेय में बढ़ोत्तरी की उम्मीद की जानी चाहिए।
कुल मिलाकर आने वाले 5 वर्षो में अगर इस ओर ध्यान नही दिया गया तो फिर किसी डिबेट में किसी व्यक्ति के द्वारा मुख्यमंत्री जी से सवाल पूछने पर वे क्या जबाब देंगे क्यूंकि अब जो वर्तमान समय उत्तर प्रदेश की राजनीती का है वो "चित भी मेरी और पत भी मेरी" वाला समय है। आने वाले ढाई वर्ष में केंद्र और राज्य दोनों की सरकारे भाजपा की होने के कारण इस "गीता प्रेस" संस्था को अब अपने अच्छे दिन दिखाई पड़ने लगे हैं। बाकि उम्मीद पर तो दुनिया कायम है और संस्था तो काफी वर्षो से उम्मीदों के साये में ही जी रही है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें