पिछले चार पांच महीने से ऑफिस में एक ही रूटीन वर्क से परेशान हो चला था मन, लिहाजा सोच तो रखा था कि अब निकलने का समय आ गया है, लेकिन दिल्ली अभी दूर थी।
मेरे लिए शहर से बाहर घूमने के लिहाज से सबसे पहली प्राथमिकता सुकून और शांति होती है, जो लखनऊ, दिल्ली, मुंबई में तो संभव नही। रही बात पहाड़ों की तो उनसे तो शायद पिछले जन्म का नाता है कोई।
यदि आप शहर के प्रदूषणयुक्त, वाहनों के शोर, शहरों की जाम से कुछ ही दिन के लिए भी निजात पाना चाहते है तो करीब के कुमाऊं के पहाड़ आपके लिए मुफीद स्थान है।
दो दिन चली चर्चाओं पर अंतोगत्वा दिनांक 12 को ब्रेक लगा जब पता चला तत्काल में भी टिकट नहीं मिले, फिर भी जाने की कसक ऐसी कि चलो जनरल में ही चलते है, सोचकर 13.04.23 को 9 बजे तक काम निपटाकर सीधे घर, दो जोड़ी कपड़े पैक करके लेट गए, रात में 2.30 बजे उठकर 4 बजे की ट्रेन पकड़कर चल दिए गंतव्य कुमाऊं की ओर।
प्रातः काल जब अंधेरा छंट रहा था, रुद्रपुर के आगे का कोई हिस्सा था, ठंडी हवाएं गेट से अंदर आकर एहसास दिलाने को आतुर थी कि गर्म कपड़ों के स्थान पर केवल शर्ट पहनकर आना तुम्हारी भूल है। यहां 16 डिग्री के एसी की ठंडक से ज्यादा ठंडक रोज रहती है।
खैर काठगोदाम पहुंचते पहुंचते पहाड़ मानो इतने करीब लगने लगते है, जैसे सभी स्वागत में हाथ फैलाए खड़े हो।
स्टेशन से बाहर निकलते ही स्कूटी किराए पर लेकर चल पड़े कुमाऊं के उन रास्तों पर जिन पर जाने को न जाने कितने दिनों से दिल बेचैन था।
सर्पीली सड़कों पर अपनी लेन में बाएं सटकर दौड़ती गाडियां उत्तराखंड में होने का एहसास करा रही थी, बीच बीच में लेन तोड़कर घुमाव पर ओवरटेकिंग करने वाली काली फिल्म चढ़ी गाडियां हरियाणा और दिल्ली का होना अपने तरीको से बताकर ध्यान आकर्षित कर रही थी।
क्रमशः.....







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