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मेरी कुमाऊं यात्रा


भारत में कश्मीर को धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है लेकिन कश्मीर के अलावा
अगर आप उत्तराखंड की पहाड़ियों को देखेंगे या उनकी खूबसूरती को महसूस
करेंगे तो पाएंगे कि उत्तराखंड भी किसी स्वर्ग से कम नहीं है।



पेश है उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर से अभी हाल ही में अगस्त माह में
मित्र शोभित के साथ की गई उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की बाइक यात्रा का
वृतांत।







उत्तराखंड वैसे ही अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है लेकिन बारिश के बाद
पहाड़ों पर जो खूबसूरती और हरियाली देखने को मिलती है वह वाकई में मन मोह
लेती है। उत्तराखंड राज्य में दो मंडल है एक कुमाऊं दूसरा गढ़वाल ।
कुमाऊं मंडल में 6 जबकि गढ़वाल मंडल में 7 जिले आते है।



मैदानी इलाकों के बीच में बसा हुआ हमारा शहर शाहजहांपुर जो अगस्त में 40
से 42 डिग्री के बीच में तप रहा था उसी समय मेरी बात फोन पर मेरे मित्र
शोभित से हुई, उसके द्वारा भी अपनी इच्छा कहीं घूमने की जताई गई।

फाइनल हुआ कि उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा क्षेत्र के आसपास के
क्षेत्रों का भ्रमण किया जाएगा।

चूंकि तीन दिन की छुट्टी ऑफिस से, वो भी घूमने के लिए मिलना काफी कठिन
काम था, इसलिए तय किया गया कि अगस्त माह के द्वितीय शनिवार, रविवार एवं
सोमवार (ईद के कारण अवकाश) के दिनों में घूमना रखा जाएगा और शुक्रवार को
कोशिश करके ऑफिस 5 बजे से पहले हर हाल में छोड़ना होगा ताकि रात होते
होते हम अपनी यात्रा के बेस कैंप काठगोदाम तक पहुंच जाएं।

खैर शुक्रवार का दिन भी आया, ऑफिस आकर सबसे पहले जरूरी काम निपटाया, घड़ी
में समय देखा तो 12 बज चुके थे, व्हाट्सएप पर नजर पड़ी तो शोभित के कई
मेसेज दिखे।

एक को खोला उसमे लिखा था - भाई जल्दी निकलने की कोशिश करना, मौसम भी शायद खराब है।

दूसरा मेसेज ऑफिस के डायरेक्टर सर का था- आज वो फाइल बना देना (डायरेक्टर
सर आज बाहर गए थे)

इन दोनों मेसेज को पढ़कर जैसे लगा कि शायद आज नहीं जा पाऊंगा क्यूंकि
दोनों मेसेज एक दूसरे के विपरीत थे, एक तरफ मित्र कह रहा था जल्दी
निकलो,दूसरी तरफ साहब काम करने को बोल रहे थे।



आपाधापी में फाइल बनाकर डायरेक्टर सर की टेबल पर रखकर घड़ी में समय एक
बार फिर देखा तो 1.30 बज चुका था, तुरंत एक एप्लीकेशन हॉफ डे लीव की
लिखकर साहब को व्हाट्सएप किया, उधर से संतोषजनक उत्तर मिलते ही तुरंत घर
की तरफ भागा।

घर पहुंचकर बैग उठाया, जो एक रात पहले से ही तैयार था, एक दो जरूरी
डोक्युमेंट रखकर सीधे चौराहे पर पहुंचकर बस स्टेशन का ऑटो पकड़ा, स्टेशन
पहुंचकर पता चला कि पीलीभीत की बस अब दो घंटे बाद है।



दो घंटे, इतने समय में तो प्राइवेट जीप, टेंपो से पीलीभीत तक पहुंच
जाएंगे - मेरे दिल ने कहा।



शोभित को फोन कर अलर्ट किया कि मैं मैक्स से निकल रहा हूं, दरअसल शोभित
मुझे शाहजहांपुर पीलीभीत मार्ग पर पड़ने वाले कस्बे बीसलपुर में मिलने
वाला था, शोभित का घर बीसलपुर से 12 किलोमीटर दूर था, यहीं से दरसअल
हमारी औपचारिक यात्रा की शुरुआत होनी थी।

मैक्स वाले ने गाड़ी और यात्रियों की क्षमता के विपरीत खूब ढेर सी सवारी
बैठाई और बाहर लटकाई भी, खैर थोड़ी ना नुकुर के बाद मैक्स चली।

 चलते ही स्पीड 90 को छूने लगी, पीछे बैठे होने के कारण मेरा सिर ऊपर छत
में लड़ रहा था, एक बार ढ़ंग से चिल्लाने पर उसने स्पीड कुछ देर के लिए
कम की। लगभग एक घंटा दबे फसे रहने के बाद हम बीसलपुर दोपहर के तीन बजे
पहुंचे। चौराहे के उस पार खड़ा शोभित मेरी हालत देखकर मुस्कुरा रहा था।



अब हम दोनों अगली गाड़ी के लिए आगे के टैक्सी स्टैंड गए जहां से एकबार
फिर बोलेरो का सहारा पीलीभीत तक के लिए मिला, लेकिन इस बार बात आगे बैठने
की तय हुई, आगे बैठने से एक तो हवा भी लगी इसके साथ साथ आगे केवल तीन लोग
ही बैठ सकते थे, और यहां गेट पर लटकने वाला कोई प्राणी भी न था।

सवारियां लेते, उतारते हुए हम करीब 4.30 बजे पीलीभीत पहुंचे। पीलीभीत
पहुंचते पहुंचते घर से दो कॉल मिस के रूप में फोन पर चढ चुकी थी। लोकेशन
बताने के बाद पीलीभीत से सितारगंज अथवा काठगोदाम की बस के लिए हम पीलीभीत
बस स्टैंड पहुंचे पर अफसोस यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया।

वहीं एक ड्राइवर ने बताया कि आसाम चौराहे से कोई प्राइवेट बस या टेंपो
देखो जो काठगोदाम जा रहा हो, सरकारी बस तो अब रात में 8 बजे है वो भी
जाएगी या नहीं ये उस वक्त मौजूद सवारियों पर निर्भर होगा।



हमारा और शोभित का टारगेट 8 बजे तक हर हाल में काठगोदाम पहुंचने का था,
इसी सोच को मन में लिए हम पीलीभीत के आसाम चौराहे पहुंचे, जहां करीब 15
मिनट इंतजार के बाद एक स्कूली बस हमारे करीब आकर रूकी, खिड़की से झांक कर
क्लीनर ने आवाज दी, -"है कोई काठगोदाम "?



नेकी और पूछ पूछ।

सीधा दौड़ लगाकर बस के अंदर, पहुंचते ही क्लीनर द्वारा बताया गया कि बस
में पुड़िया पान ना खाना, दूसरी बात बस सीधे काठगोदाम ही रुकेगी।

क्लीनर की बातें सुन हमें एहसास हो गया था कि इस स्कूल का मैनेजमेंट काफी
सख्त होगा, शायद तभी क्लीनर आम सवारियां बैठाने से डर रहा था। बाद में
बातो बातो में क्लीनर ने बताया कि अगले तीन दिन स्कूल की छुट्टी है,
लिहाजा बस में रिपेयरिंग का थोड़ा काम भी होना है जिस कारण इसे काठगोदाम
तक ले जा रहे है, इसकी एजेंसी पर।



बस के चलते ही नींद सी आने लगी थी क्यूंकि पिछले लगभग 90 किलोमीटर के सफर
में जिस जानवर की तरह हमे बैठाया गया था, पूरा शरीर अकड़ गया था। अब 2*2
की एक एक सीट पर हम और शोभित लेटे हुए थे, पूरी बस में हम दोनों के सिवा
एक अन्य यात्री और था।

जहानाबाद, अमरिया होते हुए हम सितारगंज पहुंच चुके थे, शाम का 7 बज चुका था,

सितारगंज से जब बस की खिड़की से बाहर झांका तो पहाड़ हल्के हल्के से नजर
आने लगे थे, सितारगंज एक सिख बाहुल्य इलाका है जहां का प्रमुख व्यवसाय
खेती है।  धान के खेतों की हरियाली सुकून दे रही थी, दूर दिखते पहाड़ की
ओर बस चलती जा रही थी।

चलते चलते लगभग एक घंटे बाद अब हवा में नमी और ठंडक का एहसास होने लगा
था, एक तो 8 बजने को था, दूसरा हम काठगोदाम में इंट्री कर चुके थे, चारो
ओर से पहाड़ों से घिरा होने के कारण काठगोदाम का मौसम भी बहुत जल्द बदलता
है।



काठगोदाम रेलवे स्टेशन के सामने उतरकर हम लोगो ने कमर सीधी की, घर फोन
करके अपनी अपनी लोकेशन बताई, उसके बाद चल दिये रात में रुकने के लिए कमरा
ढूंढने।



यहां एक बात और 👇

उत्तराखंड से मेरा विशेष लगाव है, और ये लगाव केवल घूमने के उद्देश्य तक
ही सीमित नहीं है, जब भी कभी अकेला बैठा रहता हूं तो गूगल मैप में
सैटेलाइट सेटिंग कर उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों को देखता रहता हूं,
उनकी दूरियां देखता हूं, ऊंचाइयां देखता हूं। इसी क्रम में विभिन्न
प्रकार के यात्रा वृतांतो को/ पत्रिकाओं को पढ़ा भी है जिनमे ज्यादातर
घुमक्कड़ उत्तराखंड यात्रा की दुर्गम यात्रा के दौरान कुमाऊं मंडल विकास
निगम के गेस्ट हाउस वगैरह में रुके थे, तभी एक दम सामने नजर पड़ी तो
कुमाऊं मंडल विकास निगम गेस्ट हाउस का बोर्ड लगी बिल्डिंग दिखी - जाकर
पता किया तो मालूम हुआ कि दो कमरे खाली है पर उन दोनों कमरों की
व्यवस्थाएं देखकर उनके रेट काफी महंगे लगे, तभी नौकर बोला -साहब
डॉरमेट्री लेलो सस्ती रहेगी।



हमें भी उसकी बात ठीक लगी, कि केवल रात काटनी है सुबह होते ही अपने
ठिकाने के लिए चल पड़ना है।

लिहाजा डॉरमेट्री बुक की और पहुंचे डॉरमेट्री रूम में।



करीब 20 बेड आमने सामने साफ सुंदर तरीके से लगे हुए हमारा इंतजार कर रहे
थे, यहां आकर खुशी और बढ़ गई क्यूंकि थी जरूर ये डोरमेट्री लेकिन यहां हम
दोनों के अलावा अभी कोई भी नहीं आया था रुकने को।

थोड़ी देर आराम करने के बाद हम सीधे उस व्यक्ति के पास पहुंचे जिसने हमे
बाइक किराए पर देने को अपनी सहमति फोन पर दो दिन पहले ही दी थी।

दरअसल शोभित ने दो दिन पहले ही नेट पर रेंट पर बाइक के लिए इस व्यक्ति से
संपर्क किया था। कुछ एडवांस और ओरिजनल आइडी प्रूफ जमा कराने के बाद उसने
अपनी बाइक के सारे कागज और हेलमेट दिया, साथ में हिदायत भी, कि एक दिन
में 150 से ज्यादा मत चलाना वगेरह वगेरह।

उसकी बातो को अनसुना करके हम दोबारा अपने गेस्ट हाउस पहुंचे।  डोरमेट्री
में एक और व्यक्ति की इंट्री हो चुकी थी, जाते ही सवाल दागा

आप लोग कहा से ?

मैं- शाहजहांपुर से।



मैं मुरादाबाद से हूं, उसने कहा (जबकि मैंने नहीं पूछा था)



थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के बाद उस व्यक्ति की हरकतें थोड़ी सी
संदेहात्मक लगी, मैं शोभित को बाहर जाने को बोलकर एक ताला लेने चल दिया।
क्यूंकि मुझे पता था सुबह के उठे होने की वजह से बेड पर जाते ही नींद
तुरंत आयेगी, और अलमारी में कोई ताला न था, ऊपर से ये अजीब किस्म का
आदमी।  मन में और संदेह पैदा कर रहा था।



स्टेशन के सामने से 35 रुपए का ताला लेकर, बैग से खाना निकालकर बैग को
अलमारी में जैसे ही बन्द किया,

अजीब आदमी बोला- ताला क्यों डाला, यहां कोई दिक्कत नहीं है, कैमरे लगे है।

अब इसे कौन समझाता कि सबसे बड़ी दिक्कत तो तुम ही हो।



खैर खाना खाकर बेड पर लेटकर सुबह 4 बजे का अलार्म लगाया,



सुबह उठते ही एक अजीब सी खुशी का संचार हुआ, पहला ये कि अब थकान उतर चुकी
थी, दूसरा आज हमारी यात्रा शुरू होने वाली थी, जिसका इंतजार लगभग 15 दिन
से हम कर रहे थे।

तैयार होकर हम लोग नीचे आए, गेस्ट हाउस के नौकर से चेकआउट करने को बोला -
उसने भी अपनी फॉर्मेलिटी पूरी करते हुए सवाल दागा।

नौकर - कहां जा रहे हैं घूमने?

देखते है भाई अभी तो कोई मंजिल तय नहीं (हमने बड़े शायराना अंदाज में कहा )

हालांकि हकीकत ये थी कि तीन दिन की छुट्टी का पूरा प्लान दिमाग में था,
शोभित मेरी इस हरकत पर थोड़ा मुस्कुराया भी।

नौकर - कभी कैलाश या आदि कैलाश होकर आइए आप लोग, बहुत बढ़िया जगह है।



जायेंगे भाई, थोड़ा और कमा ले फिर, (शोभित ने कहा)

नौकर - कमाने का क्या है भाई, बाबा जब बुलाएंगे तब तो चाहे कैसे भी बैठे
हो, जाना पड़ेगा और जाओगे भी।

हां भाई इसमें कोई शक नहीं ( मैंने कहा)

फिर मैंने पूछा

भाई वैसे कैलाश मानसरोवर और आदि कैलाश का कितना खर्चा आएगा।

नौकर- कैलाश मानसरोवर का प्रति व्यक्ति लगभग एक लाख बीस हज़ार और आदि
कैलाश का प्रति व्यक्ति 45000, अरे पैसों का क्या है वो तो सब हो ही जाता
है, आप बस जाने का मन बनाईए, कैलाश मानसरोवर और आदि कैलाश हमारा निगम भी
करवाता है। और हां आपके मुख्यमंत्री तो योगी बाबा है, फुल सब्सिडी है इन
दोनों यात्राओं पर, हम आपको ये बिल बनाकर देंगे पूरी यात्रा का, आपकी
सब्सिडी आपके खाते में।



अच्छा देखते है भाई- बोलकर हम बाहर आए।

बाहर आते ही पीछे से फिर नौकर बोला - गर्म कपड़े लाए है आप लोग, ऊपर तो
काफी बादल है, उसने अल्मोड़ा की पहाड़ियों की ओर इशारा करते हुए बताया।



नहीं भाई एक इनर और शर्ट है बाकी सारी टी शर्ट, शोभित ने उस नौकर से कहा।



नौकर- भाई पहाड़ पर जब भी आओ, तो गर्म कपड़े बिना सोचे ही रख लिया करो।



खैर हमने गेस्ट हाउस से विदा ली।



हमने अपनी यात्रा जनपद शाहजहांपुर से मैक्स/बस द्वारा काठगोदाम तक तय की
फिर काठगोदाम से अगले दिन प्रातः 5 बजे मोटरसाइकिल किराए पर लेते हुए
सर्वप्रथम अल्मोड़ा के लिए निकल पड़े।



चूंकि पहाड़ों पर बाइक से यात्रा करने का यह मेरा पहला अनुभव था इसीलिए
जैसे ही बाइक काठगोदाम से अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर मुड़ी, उसी समय
गोल गोल घुमावदार चक्करों के बीच घूमती हुई बाइक पर बैठे बैठे मन में डर
के कारण एक बारगी ख्याल आया कि शायद बाइक से आने का निर्णय गलत लिया,
लेकिन मित्र शोभित के समझाने पर दिल को थोड़ी तसल्ली हुई।



पहाड़ों पर चलने का थोड़ा अलग नियम है नियम यह है कि पहाड़ों पर मोड़ों
पर ओवरटेक नहीं किया जाता है और  दूसरी बात अपनी लेन को फॉलो करना होता
है शायद यही कारण है कि मैदानों की अपेक्षा पहाड़ों पर एक्सीडेंट का
रेशियो काफी कम है।



काठगोदाम से 20 किलोमीटर का सफर तय करके हम लोग भीमताल पहुंच चुके थे यही
इलाका अगर मैदानी होता तो हमें 20 किलोमीटर की दूरी तय करने में केवल 10
से 15 मिनट लगते लेकिन पहाड़ी घुमावदार मोड़ होने के कारण हमें इस 20
किलोमीटर की यात्रा तय करने में तकरीबन 35 मिनट लग गए थे। भीमताल के बाद
गाड़ी आगे बढ़ी तो सीधे कैंची धाम रुकी। कैंची धाम में दर्शन करके आगे
बढ़ते हुए हम अल्मोड़ा जिले में करीब 11 बजे पहुंचे। अल्मोड़ा जिले का
दृश्य देख कर बाइक से आने का मेरा निर्णय मुझे सही लगा हालांकि यह
सुरक्षित तो नहीं होता है लेकिन जब आप किराए की गाड़ी या टैक्सी से कहीं
जाते हैं तो संभव नहीं है कि हर जगह गाड़ी रुकवा कर ऐसे मनमोहक दृश्यों
को कैमरे में कैद किया जाए।



रास्ते के बीच बीच में राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे लगे बोर्ड कभी कभी
हमारा डर बढ़ा देते थे जिनपर लिखा होता था-" आगे पहाड़ से पत्थर गिर रहे
हैं,कृपया एक समय में एक वाहन ही सावधानीपूर्वक निकाले "



अल्मोड़ा में कुछ देर फोटोग्राफी करने के बाद हमारा अगला पड़ाव जागेश्वर
धाम था। अल्मोड़ा से जागेश्वर धाम वाले मार्ग पर एक स्थान पनुआनाला पड़ता
है जहां से वृद्ध जागेश्वर एवं जागेश्वर धाम के लिए अलग अलग मार्ग है

जागेश्वर धाम से पहले वृद्ध जागेश्वर के दर्शन करना अच्छा माना जाता है
इसलिए हमने अपनी गाड़ी वृद्ध

जागेश्वर वाले मार्ग पर मुड़ा दी। वृद्ध जागेश्वर के करीब 8 किलोमीटर
लंबे मार्ग पर जगह-जगह गड्ढों की भरमार थी, फिर भी बचते बचाते हम लोग
वृद्ध जागेश्वर पहुंचे जहां पहुंचकर वृद्ध जागेश्वर महाराज के दर्शन कर
आशीर्वाद प्राप्त किया इसके बाद फिर वापसी करते हुए पनवा नाला तक पहुंचे
और मोटरसाइकिल जागेश्वर धाम की ओर बढ़ा दी। यहां एक बात बताना और जरूरी
है कि वृद्ध जागेश्वर और जागेश्वर धाम के बीच केवल एक पहाड़ी लांघने भर
की करीब 3 किलोमीटर की पैदल रास्ता है, जो वृद्ध जागेश्वर से ठीक सामने
जागेश्वर धाम में मिलती है, लेकिन बाइक होने की वजह से हमें यही चक्कर 16
किलोमीटर का पड़ने वाला था, पहाड़ों पर एक किलोमीटर का भी रास्ता होता है
लेकिन घुमाव होने के कारण वही रास्ता कई किलोमीटर में परिवर्तित हो जाता
है।



पहाड़ो पर मौसम कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता, हल्की बारिश के बाद सड़के
थोड़ी गीली हो गई थी, जिस कारण बाइक चलाना थोड़ा भारी पड़ रहा था।

 जागेश्वर धाम उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित शिव जी का प्रसिद्ध
तीर्थ स्थान है जिसकी पहाड़ ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत में मान्यता
है। माना जाता है कि शिवजी धरती पर प्रथम बार जागेश्वर धाम में ही प्रकट
हुए थे जागेश्वर धाम मंदिर तकरीबन 125 छोटे छोटे मंदिरों का समूह है
देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ पूरा इलाका आपको पहाड़ों को निहारने के लिए
मजबूर कर देगा।



जागेश्वर धाम दोपहर के 2 बजे पहुंचकर एक जगह रुक कर नहा धोकर मंदिर के
लिए पैदल ही प्रस्थान किया। मंदिर में जगह जगह लोग विभिन्न प्रकार की
पूजा करवा रहे थे, पहाड़ी संगीत, मंदिर की घंटियों ने वातावरण में एक अलग
सा धार्मिक माहौल बना दिया था।

 अल्मोड़ा से जागेश्वर धाम की दूरी तकरीबन 45 किलोमीटर है।

दर्शन करने के बाद तय हुआ कि बाइक शोभित न चलाकर मुझे चलानी होगी,क्यूंकि
सुबह काठगोदाम से अल्मोड़ा (जिसकी दूरी करीब 90 फिर वहां से जागेश्वर धाम
जो कि 45 किलोमीटर है, ये सारी दूरी शोभित ने ही बाइक चलाकर तय की थी)



मंदिर से वापसी करते हुए एक रेस्टोरेंट में खाना खा कर सीधे पिट्ठू बैग
पीठ पर लादे और निकल पड़े अल्मोड़ा के लिए वापस।



वापसी में एक स्थान चितई भी पड़ता है, जहां गोलू देवता का प्रसिद्ध मंदिर
है। गोलू देवता पहाड़ों खासकर कुमाऊं के लोक देवता है, और त्वरित न्याय
के देवता भी माने जाते है। इस मंदिर में पहुंच कर पता चला कि यहां अर्जी
लगती है, लोग अपनी समस्याएं लिखकर गोलू देवता के समक्ष रखते है, और
समस्या का समाधान होने पर घंटी चढ़ाते हैं।

यहां दर्शन करने के दौरान थोड़ी देर हो गई थी, और अल्मोड़ा अभी भी करीब
28 किलोमीटर बाकी था। अल्मोड़ा राजमार्ग पर टैक्सी और किराए की गाड़ियों
का रात्रि 8 बजे के बाद आवागमन प्रतिबंधित है। शाम में जल्द अंधेरा होने
के कारण सामने से आते वाहनों की लाइट अब आंखो में चुभने लगी थी।



(अल्मोड़ा से जागेश्वर धाम- वृद्ध जागेश्वर धाम और कौसानी अलग अलग रूट पर
है, अगर आप पहले कौसानी जाते है तो वापसी आपको अल्मोड़ा की करनी ही
पड़ेगी, ठीक इसी तरह अगर आप जागेश्वर धाम पहले जाते है तो भी अल्मोड़ा
आपको वापिस आना ही पड़ेगा।)



अगले दिन सुबह हम लोगो का प्लान अल्मोड़ा से बागेश्वर राजमार्ग पर स्थित
भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले प्रसिद्ध स्थल कौसानी घूमने का
था, तभी शोभित द्वारा मशविरा दिया गया कि अल्मोड़ा से कौसानी के लिए
जितनी ज्यादा से ज्यादा दूरी अभी तय कर लेंगे, सुबह उतना ही फायदा रहेगा।
अल्मोड़ा पहुंचकर बाईपास लेते हुए हम सुनौली गांव में रात्रि 8 बजे
पहुंचकर एक होम स्टे में रुके।

होम स्टे से आधा किलोमीटर दूर एक रेस्टोरेंट में हम दोनों ने खाना का
ऑर्डर दिया, खाने में आज मैगी बनाने को बोला।



खाना खाकर जैसे ही अपने होम स्टे पहुंचे तो होम स्टे के मालिक के दो झबरे
पहलवान रूपी कुत्ते हम दोनों का स्वागत अपने अंदाज में करने को तत्पर
बैठे दिखे, चूंकि हमने कई प्रजातियों के कुत्ते कई दफा पाले हुए है,
लिहाजा शोभित ने मुझे आगे किया। जीने के पास घुटनों के बल बैठकर जैसे ही
मैंने उन्हें पुचकारा, वो तो चिंटू हो गए, फिर तो पूरी रात में जितनी बार
भी निकलना हुआ,उन्होंने अपनी पूंछ हिलाकर मेरा अभिवादन किया, जैसे कह रहे
हो कि अब आपको कहीं भी जाने की सहर्ष अनुमति है।



उसके बाद सीधे आकर बिस्तर पर जो गिरे, फिर कब नींद आई पता ही नहीं चला।
सुबह शोभित ने हिलाया और हड़बड़ाते हुए बोला कि भाई उठ देर हो गई, उठे तो
देखा 5.30 बज चुके थे, तुरंत तैयार होकर करीब 6 बजे जब हम अपने होम स्टे
से बाहर निकले तो बाहर का नजारा हैरान करने वाला था, रात में अंधेरा होने
के कारण हमे अंदेशा ही नहीं था कि हम रुके किस खूबसूरत जगह पर है।



कमरे के सामने पहाड़ पर घिरे हुए बादल जो हमारे कमरे की ऊंचाई के बराबर
थे, इतने करीब बादलों को देखकर दिल खुश हो गया और लगा कि यहां करीब एक
महीना गुजारने को मिल जाए तो समझ लिया जाएगा कि जिंदगी का सारा सुख मिल
गया।

खैर होम स्टे से विदाई लेते हुए हम अपने अगले पड़ाव कौसानी के लिए रवाना
हो गए, रास्ते में कोसी नदी हमारे साथ कलकल बहती हुई चल रही थी, साफ
पानी, पड़ोस में गांव,जिनके घर में अभी अभी चूल्हे जले थे, उन घरों से
चूल्हों की चिमनियों से निकलता धुआं, दो गांवो को जोड़ते पुल और सीढ़ीदार
खेती को देखकर बचपन के वो चित्र आंखो में तैर गए जब चित्रकला के क्लास
में सीनरी बनाने में हम इन्हीं व्यूज का इस्तेमाल करते थे, आज वही दृश्य
साक्षात सामने थे।



रहा नहीं गया तो उतरकर एक बार फिर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की।

उसके बाद पुनः सफर शुरू करते हुए हम करीब पौने 2 घंटे बाद कौसानी पहुंचे
कौसानी को मिनी स्वीटजरलैंड इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी खूबसूरती
स्विट्जरलैंड से कम नहीं है। कौसानी से सूर्योदय और सूर्यास्त देखने के
लिए हजारों की संख्या में पर्यटक रात्रि में रुकते हैं और सुबह कौसानी
में ही सूर्योदय के रूप में पहाड़ों पर सोने सी बिछी चादर को देखते हैं।



अनाशक्ति आश्रम  जो कि महात्मा गांधी जी की याद में बनवाया गया है उसी
आश्रम से हिमालय व्यू प्वाइंट से सूर्योदय का नजारा अद्भुत होता है,
सामने नंदा देवी और हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं नजर आती है।

क्योंकि सुबह 5:30 बजे के हम लोग अल्मोड़ा से चले हुए थे और अब पेट में
चूहे भी कूदने लगे थे, लिहाजा आदित्य भोजनालय में आलू के पराठे का आर्डर
दिया साथ में दो चाय भी।



नाश्ता करने के बाद अपने अपने बैग उसी भोजनालय वाले दुकान में रखकर हम
लोग अपने अगले पड़ाव अनासक्ति आश्रम, सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली मैं
बने संग्रहालय एवं कौसानी से बागेश्वर राष्ट्रीय राजमार्ग पर तकरीबन 28
किलोमीटर दूर बैजनाथ धाम मंदिर के लिए रवाना हुए |

सर्वप्रथम अनासक्ति आश्रम में जाकर हिमालय व्यूप्वाइंट को देखा जहां से
आज हमें हिमालय के दर्शन नहीं हुए क्योंकि बारिश का मौसम होने के कारण
बादल घिरे हुए थे लिहाजा संग्रहालय देखने के बाद सुमित्रानंदन पंत की
जन्म स्थली/संग्रहालय को देखने पहुंचे।



लगभग आधे घंटे के बाद कौसानी से बैजनाथ धाम के लिए बाइक घुमाई रास्ते में
तकरीबन 10 किलोमीटर चलने के बाद एक साइन बोर्ड नजर आया जिस पर लिखा था
चाय के बागान और तीर का निशान ठीक सामने की ओर था। जीवन में शायद मेरे
लिए पहला मौका था जब चाय के बागानों में मेरा घूमना हुआ वहां से निकलने
के बाद बैजनाथ धाम पहुंचते-पहुंचते दोपहर के 11:30 बज चुके थे मंदिर में
दर्शन करने के उपरांत यह तय हुआ कि वापसी करने से पहले आठ 10 किलोमीटर और
आगे तक हो आया जाये, गोल गोल घूमते रास्तों पर बाइक चलाने का अब मजा आ
रहा था शायद डर अब दिल से और दिमाग से निकल चुका था।



पिंडारी ग्लेशियर से करीब 45 किलोमीटर पहले तक हम लोग जाकर फिर वापसी
कौसानी के लिए की दोपहर में  2:00  बजे हम लोग फिर कौसानी में थे।

कौसानी से अब विदा लेने का वक्त था, अब बाइक का हैंडल मैंने थामा और निकल
पड़े वापस अल्मोड़ा के लिए





45 किलोमीटर की दूरी करीब एक घंटे में तय करने के बाद, हम अल्मोड़ा की
प्रसिद्ध बाल मिठाई की दुकान "खीम सिंह मोहन सिंह" माल रोड अल्मोड़ा
पहुंचे।

दुकान में एक व्यक्ति गल्ले पर बैठा नोट गिन रहा था,जबकि दूसरा व्यक्ति
मिठाई परात में से काट काटकर डिब्बों में पैक कर रहा था,

डेढ़ किलो मिठाई पैक कराने के बाद अल्मोड़ा से सीधे हम भीमताल रुके, अब
शाम हो चुकी थी, तकरीबन 6  बज भी चुका था, सुबह का नाश्ता किए हुए हम लोग
120 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर चुके थे, अब पेट दोबारा खाने की खेप
मांग रहा था,



उधर भीमताल के किनारे लव बर्डस की जोड़ियां एक दिन पहले की अपेक्षा कुछ
ज्यादा थी, ये शायद वीकेंड्स का असर था।

नज़रे उधर ही गड़ी हुईं थीं, अचानक टेबल पर किसी ने मोमोज की दो प्लेट रखी,



मेरे साथी ने दरअसल मेरे मोमोज की दुकान के बाहर टहलते वक्त ऑर्डर दे दिया था।

खाने के बाद एक बार फिर रात को रुकने को लेकर मेरी अपने साथी से बहेस
बाजी शुरू हुई। दरअसल मैं किसी भी हालत में नैनीताल नहीं जाना चाहता था,
जो कि भीमताल से केवल 30 किलोमीटर था जहां से काठगोदाम 25 किलोमीटर है।
मेरा सीधा सा कहना था कि 2400 मीटर की ऊंचाई पर घूम कर आने के बाद
नैनीताल जाने का क्या फायदा। मेरा मत सीधे काठगोदाम चलकर रूम लेकर रुकने
का था।



लिहाजा मेरी एक बार फिर जीत हुई, वहां से सीधे काठगोदाम पहुंचे। सुबह 5
बजे से शाम के 8 बजे तक 355 किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाने के बाद अब हाथ और
पैर ज़बाब दे रहे थे।

पहले दिन जिस कुमाऊं मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस में रुके थे ,उसी में
दोबारा रूम लेकर गद्दे पर जो गिरे फिर सुबह ही आंख खुली,



अब हमारी विदाई का समय था, काठगोदाम और कुमाऊं से कभी ना भुलाई का सकने
वाली ढेर सारी यादों के साथ हम हल्द्वानी डिपो की बस में सवार हो गए।

बस आगे बढ़ रही थी, मैं पीछे छूटते पहाड़ों पर अपनी नजर गड़ाए देख रहा
था, जैसे पहाड़ मुझसे कह रहे हो कि अगली बार फिर आना मुझे निहारने, पर
थोड़े और वक्त के साथ।











अल्मोड़ा जिले से 100 किलोमीटर के आस पास घूमने वाली जगह



अल्मोड़ा, कौसानी, जागेश्वर धाम, वृद्ध जागेश्वर धाम, गोलू देवता का
मंदिर, कसार देवी मंदिर, कैंची धाम,बैजनाथ धाम एवं बागेश्वर

अगर आप ट्रैकिंग के शौकीन है तो बागेश्वर जिले से 60 किलोमीटर की दूरी पर
पिंडारी ग्लेशियर है। जिसका ट्रैक छोटे बच्चे तक कर सकते हैं।





कैसे पहुंचे



काठगोदाम सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन है, जहां से नई दिल्ली,
मुरादाबाद,जैसलमेर,लखनउ आदि के लिए ट्रेन उपलब्ध है। काठगोदाम पहुंचकर आप
अपनी निजी अथवा टैक्सी किराए पर लेकर यात्रा कर सकते हैं। सबसे नजदीकी
एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून है जो काठगोदाम से करीब 250
किलोमीटर की दूरी पर है



कब कब जाए





जाने के लिए सबसे उपयुक्त समय सितंबर से मार्च तक है। हालांकि बारिश में
फिसलन का खतरा पहाड़ों पर थोड़ा ज्यादा रहता है लेकिन बारिश के बाद खिले
हुए हरेभरे पहाड़ों की खूबसूरती के लिए अगस्त सितम्बर सबसे उपयुक्त समय
है। अगर आपको बर्फबारी देखनी है तो आपको दिसंबर या जनवरी में आना पड़ेगा।

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