पिछले दो सालो में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र पीलीभीत, मैलानी जिलो में करीब दो दर्जन से ज्यादा लोग बाघ का शिकार हो चुके है, इन सभी घटनाओ में अधिकतर घटनाओ में वही व्यक्ति बाघ या जंगली जानवर का शिकार हुआ जो बाघ अभ्यारण, टाइगर रिजर्व में प्रतिबंध होने के बाबजूद अंदर गया. 22 से अधिक मौतें, वो भी एक के बाद एक, इन सभी घटनाओ के बाद गाँववालों (खासकर बाघ या अन्य जंगली जानवर का शिकार हुए व्यक्ति के परिजनों) का पुलिस प्रसाशन पर गुस्सा करना, तोड़फोड़ करना लाज़मी है, स्थानीय नेताओं ने भी ऐसे वक्त में अपनी राजनीती चमकाने में कोई कसर नही छोड़ी लेकिन किसी ने भी सरकार का ध्यान इस ओर दिलाने की नही सोची कि बाघों या अन्य जंगली जानवरों द्वारा आबादी के पास या अंदर आकर व्यक्तियों का शिकार करने का प्रमुख कारण क्या है ? दरअसल पशुओ से हमारे रिश्ते एक जैसे कभी नही रहे, एक प्रजाति के तौर पर हमने अपने लालच को सामने रखकर ये तय कर लिया कि किसे घर में रखना है और किसका संहार करना है, कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जिस जानवर से कोई प्रत्यक्ष लाभ नही हुआ उसे “खत्म” करने की नीति बनी और जो लाभकारी साबित हुआ उसे पवित्र और धार्मिक घोषित कर दिया गया.
वर्तमान में मांसाहारी पशु तो बहुत बुरी हालत में है. वनों में वन्य प्राणियों की कमी के कारण मांसाहारी पशु अब गाँव में आबादी के बीच जाकर मवेशियों या कभी कभी मनुष्यों को ही अपना शिकार बना रहे हैं. वन विशेषज्ञों के अनुसार मानवजनित या प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही मानव पर हमला करने को विवश करती हैं. पिछले करीब पांच दशकों पहले तक जब बाहुल्य क्षेत्रफल में जंगल थे तब मनुष्य और वन्यजीव दोनों अपनी अपनी सीमाओ में सुरक्षित रहे लेकिन बदलते दौर में विकासशील भारत में जब आबादी बढ़ी तो वनों का अंधाधुंध विनाश किया जाने लगा, जिसके परिणामस्वरूप जंगलो का दायरा सिमटकर एक निश्चित क्षेत्र तक ही सीमित रह गया. वन्यजीव बाहर निकलकर भागे और उसके बाद शुरू हुआ न खत्म होने वाला मनुष्य और वन्यजीवों के संघर्ष का वो दौर जो अभी भी बदस्तूर जारी है.
उत्तर प्रदेश के तराई के क्षेत्रों में पिछले कुछ सालो पहले जब बाघों का कुनबा बढ़ा तो प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने उस क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया, चूँकि टाइगर रिजर्व होने के बाद भी प्रशासन एवं वन्यकर्मियों की मिलीभगत से इन जंगलो के अंदर अनधिकृत रूप से शिकारियों का जाना जारी रहा, जिन्होंने बड़े पैमाने पर चीतल, हिरन, बारहसिंघा का शिकार किया, जो कि बाघों के प्रमुख भोजन हैं , यह भी एक कारण है, जो बाघ अपनी भूख मिटाने बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं.
विकास के नाम पर जंगलो को काटने और ठिकानों पर कब्ज़ा होते देखकर जानवर शहरी क्षेत्रों या आबादियों की ओर रुख कर रहे हैं, इसी कारण कहीं न कहीं वे हिंसक भी हो रहे हैं. वन्यजीवों का मनुष्य के साथ टकराव की समस्या लगातार गंभीर रूप धारण कर रही है और राज्य सरकारें केवल मुआवजा देकर अपने उपर लगे आरोपों से मुक्त हो जाना चाहती है जबकि समस्या का स्थायी हल केवल और केवल पर्यावरण एवं वन संरक्षण के जरिये ही संभव है, इसको रोकने के लिए वन्यजीवों के अंधाधुंध शिकारों पर सख्ती से रोक लगायी जाये एवं जीवों के प्राकृतिक निवास स्थानों के आस पास मानविक घुसपैठ को रोका जा सके.
पर्यावरण असंतुलन को बढ़ावा देने में कई तरह के कारक शामिल है. इसका अहसास भी हो रहा है, बाबजूद इसे गंभीरता से नही लिया जा रहा है, जिससे सरकारी या गैर सरकारी सभी योजनायें/अभियान सिर्फ फाईलो तक सिमटकर रह जाता है. रातो रात अमीर बनने की चाहत और सुविधा का उपभोग करने की ललक में न केवल पेड़ो की कटाई हो रही है, बल्कि काटे गये पेड़ की जगह दूसरा पौधा लगाने की फ़िक्र भी नही है. सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम में स्थानीय लोगो का जुड़ाव नही हो पाता, संस्थायें पेड़ पौधे लगाकर चली जाती हैं और बाद में उन पौधों में कोई पानी देने वाला भी नही होता.
जंगल के नियमों के मुताबिक बाघों का जंगल के अंदर कई किलोमीटर तक का खुद का एक निर्धारित क्षेत्र होता है, उस क्षेत्र में दूसरा बाघ नही रहता, यही कारण है कि जंगलो की कमी के कारण बाघ बस्ती अथवा खेतों की ओर जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक “हर साल धरती पर से एक प्रतिशत जंगल का सफाया किया जा रहा है जो पिछले दशक से पचास प्रतिशत ज्यादा है.”
शहरीकरण के बढ़ते दबाव, विकसित होने की लालसा में अंधाधुंध होते विकास ने हमे हरियाली से भी लगभग वंचित कर दिया है, घर के एक हिस्से में आम-नीम के पेड़ लगे होना अब गुजरे वक्त की बात हो चुकी है, छोटे छोटे फ़्लैट में बोनसाई का एक छोटा सा पौधा लगाकर हम हरियाली को महसूस करने का एक भ्रम पाल रहे है. हाल ही में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर, मैलानी के जंगलो के बीच हाइवे निकालने का मामला प्रकाश में आया है, जिसके अंतर्गत लगभग 55000 पेड़ो की बलि देनी होगी, इसमें से कई पेड़ तक़रीबन 250 साल पुराने हैं. योजना से जुड़े अधिकारियो को सोचना होगा कि हाइवे निकलने से वन्यजीवों का निवास स्थान दो भागों में बंट जायेगा तथा हाइवे क्रास करने की आपाधापी में रही वन्यजीव दुर्घटना का शिकार भी होंगे.
सरकारों, आम आदमी और वन्यप्रेमियों को एक साथ एक मंच पर आकर इस बढती समस्या पर अपनी राय एकमत करनी होगी, तभी इस भीषण विभीषिका से भविष्य में बचा जा सकता है क्योंकि दुनिया की बेहतरी के लिए मनुष्य का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वन्यजीवों का होना भी है.

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