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बेरोजगारों का दर्द समझे सरकार


 उत्तर प्रदेश में पिछले डेढ़ साल में जिस तरह से हर भर्ती पेपर लीक या कोर्ट के चक्कर में लंबित पड़ी है, उससे साफ़ है कि सरकार में बैठे अधिकारी इन भर्तियो को लेकर संवेदनशील नही है. देश का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण उत्तर प्रदेश में बेरोजगारों की संख्या भी सबसे ज्यादा है, हर साल लाखो की संख्या में इंटर, ग्रेजुएशन पास करने वाले बच्चे जब किसी सरकारी नौकरी की लिखित परीक्षा देकर वापस अपने घर तक नही पहुँच पाते तब तक परीक्षा सम्बन्धी वेबसाइट पर पेपर लीक/परीक्षा स्थगित होने की जानकारी अपलोड कर दी जाती है.
  विधानसभा चुनाव् के दौरान उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीती तलाशते योगी आदित्यनाथ ने पिछली सरकारों द्वारा की जा रही कम भर्तियो पर जब सवाल खड़े किये और दावे भी किये, कि सरकार बनते ही बंपर भर्तियाँ की जायेंगी, तो युवाओ के एक बड़े तबके ने भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया पर उन बेरोजगारों की चिंता को बढ़ाने में भी सरकार ने पूरा सहयोग किया फिर चाहे वह दरोगा भर्ती का कोर्ट में चला जाना हो, पुलिस भर्ती का रद्द होना हो या फिर नलकूप आपरेटर की परीक्षा का स्थगन हो. इन सभी के अतिरिक्त हाल ही में संपन्न हुई शिक्षक भर्ती में जब बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायतें कोर्ट के पास पहुंची तो कोर्ट ने दोबारा कॉपी जांचने का आदेश जारी कर दिया, जिसके कारण अब दोबारा कॉपियो की जांच कर परिणाम घोषित किया जायेगा.
भर्ती चाहे स्थगित हो अथवा कोर्ट में जाए पर इन सभी बातो का दुष्परिणाम अभ्यर्थी को ही भुगतना पड़ता है, वह अभ्यर्थी जो सालो साल, दिन रात मेहनत करके एक अदद सी नौकरी के सपने देखता है परन्तु उसे पेपर लीक/स्थगित होने से निराशा ही हाथ लगती है.
   जिस युवा शक्ति के दम पर हम विश्व भर में इतराते घूमते है, देश की वही युवा शक्ति एक नौकरी के लिए दर दर भटकने को मजबूर है. ताजा रिपोर्टो के मुताबिक देश में बेरोजगारी का ग्राफ काफी बढ़ा है, जिन युवाओ के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाये बैठे है, उसकी नीव की हालत बेहद निराशाजनक है.
   सालो से तैयारी कर रहे युवाओ के लिए, जब अपनी राजनीती चमकाने वाले नेताओं का बयान “प्रदेश में नौकरी की नही योग्यता की कमी है” कहा जाता है तो इसी सोच के एक दूसरे पक्ष की ओर सरकार का ध्यान क्यों नही आकर्षित होता कि इक्कीसवी सदी में अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी अपनाने के बाद भी हम एक ऐसा सिस्टम नही खड़ा कर पाए है जो एक भर्ती परीक्षा को सकुशल संपन्न करा सके. बेरोजगारी नाम का शब्द दरअसल देश का ऐसा सच है, जिससे राजनीतिज्ञों, खुद को देश का रहनुमा समझने वालो ने अपनी आँखे मूंद ली हैं.
  दिसम्बर 2016 में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा लंबित पड़ी भर्तियां न करा पाना सरकार की उदासीनता बयाँ करता है. दरअसल सरकार चुनावी मौसम में इन लंबित भर्तियो का विज्ञापन निकालकर वोट पाने की लालसा में है.
  देश में बेरोजगारी की दर कम किये बिना विकास का दावा करना कभी भी न्यायसंगत नही कहा जा सकता. देश का शिक्षित बेरोजगार युवा आज स्थायी रोजगार की तलाश में है. ऐसे में बमुश्किल किसी निजी संस्थान में अस्थायी नौकरी मिलना भविष्य में नौकरी की सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा खतरा है. प्राइवेट कम्पनियों/फैक्ट्रियो के मालिको को इस बात का आभास अच्छी तरह से है, कि बेरोजगारों का दर्द क्या है, इसी की आड़ में वै कर्मचारियों का शोषण कर रही है, कम तनख्वाह में काम करने के लिए व्यक्ति तभी तैयार होता है जब उसको कहीं और काम मिलने में दिक्कत हो. इन हालातो में देश का युवा क्या करे, जब उनके पास रोजगार के लिए मौके नही है, उचित संसाधन नही है, सरकारी योजनाये सिर्फ कागजो तक सीमित हैं. नौकरियों में नये पदों के सृजन पर रोक लगी हुई है, उस पर बढती बेरोजगारी आग में घी डालने का काम कर रही है.
सरकारों को देश में बढती बेरोजगारी के लिए केवल चुनावी मौसम में कही जाने वाली बातो तक ही सीमित नही रहना होगा बल्कि उसको धरातल पर भी उतारना होगा वरना कही ऐसा न हो कि सत्ता में बैठालने वाले युवा विमुख होकर सत्ता से बेदखल भी कर दें.

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