एबीपी न्यूज़ चैनल में पिछले 24 घंटों के दौरान जो कुछ भी हुआ है , वो चौंकाने वाला बिल्कुल भी नही है.
ये एक ना एक दिन होना ही था.
जब आप सरकार की नाकामियों कॊ जनता के सामने लाने लगे, सरकार द्वारा दिये जा रहे बड़े बड़े भोजों का तिरस्कार करने लगे, और सबसे बड़ी बात जब आपके सहयोगी (गोदी मीडिया) आपके ऊपर हुई इस कार्यवाही पर चुप्पिया साधे बैठ जाये,
फिर जब इस तरीके की बाते (जबरन इस्तीफा) सामने आती है तो आपको कोई हैरानी नही होनी चाहिये..
अभिसार शर्मा, मिलिंद, पुण्य प्रसून बाजपेयी इन तीन पर आज जो गाज गिरी है उसकी गूँज आपको भविष्य में ज़रूर सुनने कॊ मिलेगी.
समय एक सा नही रहता.
कई लोग कह रहे है कि अब रवीश की बारी है, मैं कहता हूँ अब उन सब कलमकारों की बारी है जो इस मुद्दे पर अपनी ज़बान बंद कर बैठे हैं.
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का वर्तमान में क्या हाल है, किसी से छिपा नही है. ये चौथा स्तम्भ सरकार का चौपाया बनने की कगार पर है.
हालाँकि आप में से काफ़ी लोगो की वैचारिक राय होने के कारण वो मन ही मन इस फैसले पर खुश भी हो रहे होगे, पर क्या आपने सोचा है कि इस समय जो हो रहा है वो भविष्य की सरकारों कॊ इससे भी आगे बढ़कर मीडिया कॊ पालतू बनाने का रास्ता तैयार नही करेगा????
मीडिया से आप चाहते क्या है??
पहले अपनी स्थिति स्पष्ट कीजिये
मीडिया का काम समय आने पर सरकार के बेहतर कामों कॊ जनता के सामने रखना और उससे भी ज़रूरी है सरकार द्वारा किये गये ग़लत कामों कॊ सामने लाना. दूसरे शव्दो में कहे तो सरकार कॊ आईना दिखाना.
और ये बखूबी हो भी रहा था पर शव्दो का हेरफेर था, मीडिया के एक तबके ने केवल सरकार के बेहतर कामों कॊ ही जनता के सामने रखने का एक विशेष "ठेका" ले लिया या दूसरे शब्दों में कहे उसे मजबूर किया गया. और मीडिया के दूसरे तबके ने सरकार के बेहतर कामों कॊ जनता के सामने रखा ज़रुर पर उसी के साथ साथ जनता के सामने सरकार के उन कामों कॊ भी रखा जिनके दम पर सरकार ने वोट लिये थे.
बस यही कारण था जो पिछले कई हफ्तों से चैनल विशेष के सिग्नल कॊ बाधित किया जा रहा था वो भी एक निश्चित समय पर..
क्या आपको नही लगता कि सरकार के कामों का पूरे दिन बखान करने के लिये सरकार के निजी सरकारी चैनल "डीडी" काफ़ी थे, जिसकॊ हम पैसे ख़र्च करके देखते है जबकि सभी प्राइवेट न्यूज़ चैनल फ्री ऑफ कॉस्ट होते है.
आप ज़रा सोचिये जो जिम्मेदार है वो जिम्मेदारी से बच रहा है या बचाया जा रहा है...
आज जो कुछ भी हो रहा है निश्चित रुप से आने वाले समय के लिये आपके, हमारे सबके लिये घातक होगा क्यून्कि अगर किसी मुसीबत में सरकार के विरोध में अपनी बात रखने के लिये जब हम कोइ सशक्त जरिया/माध्यम तलाशेंगे तो अफसोस ही होगा और कुछ नही...
क्यून्कि तब तक मीडिया नाम शायद ही बचे.....
ये एक ना एक दिन होना ही था.
जब आप सरकार की नाकामियों कॊ जनता के सामने लाने लगे, सरकार द्वारा दिये जा रहे बड़े बड़े भोजों का तिरस्कार करने लगे, और सबसे बड़ी बात जब आपके सहयोगी (गोदी मीडिया) आपके ऊपर हुई इस कार्यवाही पर चुप्पिया साधे बैठ जाये,
फिर जब इस तरीके की बाते (जबरन इस्तीफा) सामने आती है तो आपको कोई हैरानी नही होनी चाहिये..
अभिसार शर्मा, मिलिंद, पुण्य प्रसून बाजपेयी इन तीन पर आज जो गाज गिरी है उसकी गूँज आपको भविष्य में ज़रूर सुनने कॊ मिलेगी.
समय एक सा नही रहता.
कई लोग कह रहे है कि अब रवीश की बारी है, मैं कहता हूँ अब उन सब कलमकारों की बारी है जो इस मुद्दे पर अपनी ज़बान बंद कर बैठे हैं.
लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का वर्तमान में क्या हाल है, किसी से छिपा नही है. ये चौथा स्तम्भ सरकार का चौपाया बनने की कगार पर है.
हालाँकि आप में से काफ़ी लोगो की वैचारिक राय होने के कारण वो मन ही मन इस फैसले पर खुश भी हो रहे होगे, पर क्या आपने सोचा है कि इस समय जो हो रहा है वो भविष्य की सरकारों कॊ इससे भी आगे बढ़कर मीडिया कॊ पालतू बनाने का रास्ता तैयार नही करेगा????
मीडिया से आप चाहते क्या है??
पहले अपनी स्थिति स्पष्ट कीजिये
मीडिया का काम समय आने पर सरकार के बेहतर कामों कॊ जनता के सामने रखना और उससे भी ज़रूरी है सरकार द्वारा किये गये ग़लत कामों कॊ सामने लाना. दूसरे शव्दो में कहे तो सरकार कॊ आईना दिखाना.
और ये बखूबी हो भी रहा था पर शव्दो का हेरफेर था, मीडिया के एक तबके ने केवल सरकार के बेहतर कामों कॊ ही जनता के सामने रखने का एक विशेष "ठेका" ले लिया या दूसरे शब्दों में कहे उसे मजबूर किया गया. और मीडिया के दूसरे तबके ने सरकार के बेहतर कामों कॊ जनता के सामने रखा ज़रुर पर उसी के साथ साथ जनता के सामने सरकार के उन कामों कॊ भी रखा जिनके दम पर सरकार ने वोट लिये थे.
बस यही कारण था जो पिछले कई हफ्तों से चैनल विशेष के सिग्नल कॊ बाधित किया जा रहा था वो भी एक निश्चित समय पर..
क्या आपको नही लगता कि सरकार के कामों का पूरे दिन बखान करने के लिये सरकार के निजी सरकारी चैनल "डीडी" काफ़ी थे, जिसकॊ हम पैसे ख़र्च करके देखते है जबकि सभी प्राइवेट न्यूज़ चैनल फ्री ऑफ कॉस्ट होते है.
आप ज़रा सोचिये जो जिम्मेदार है वो जिम्मेदारी से बच रहा है या बचाया जा रहा है...
आज जो कुछ भी हो रहा है निश्चित रुप से आने वाले समय के लिये आपके, हमारे सबके लिये घातक होगा क्यून्कि अगर किसी मुसीबत में सरकार के विरोध में अपनी बात रखने के लिये जब हम कोइ सशक्त जरिया/माध्यम तलाशेंगे तो अफसोस ही होगा और कुछ नही...
क्यून्कि तब तक मीडिया नाम शायद ही बचे.....
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