हमारा देश भारत भीड़तंत्र के द्वारा किये
गये कारनामो को पहले भी कई बार देख चुका है जिनके कारण भारत की पूरी दुनिया में
किरकिरी हुई है. चाहे वह 84 के दंगे रहे हो या फिर दादरी, अलवर जैसे नये मुद्दे.
सालो से शांत इस भीड़तंत्र का पिछले डेढ़ दो सालो से ज्यादा उत्तेजित होकर उत्पात इस
स्तर तक मचाना कि उसमे किसी व्यक्ति की जान चली जाए. ये कहीं न कहीं समाज, सरकार
दोनों को सचेत करने के लिए काफी है कि भीड़ के बहाने या भीड़ में छिपकर किसी से अपनी
निजी दुश्मनी निकालना कितना आसान है.
भारत भले ही दुनिया की सबसे पुरानी
सभ्यता हो पर राष्ट्र के तौर पर काफी युवा है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा
लोकतांत्रिक एवं विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है. भारत में लोकतंत्र को एक
मशीन की तरह आसानी से चलना चाहिए लेकिन कुछ हानिकारक तत्व इस काम में बाधा डालते
है, इसका नतीजा ये होता है कि भारत के संवैधानिक लक्ष्य और लोकतांत्रिक
आकांक्षायें पूरी नही हो पाती. पिछले दो वर्षो में भीड़ द्वारा बिना सबूत और गवाह
के केवल अफवाहों पर विश्वास करके जिस तरीके से लोगो को मौत के घाट उतारा तब
सुप्रीम कोर्ट को मध्यस्थता करते हुए कहना ही पड़ा कि भीड़ द्वारा की गयी हत्या
कानून व्यवस्था की समस्या नही बल्कि अपराध है और राज्यों का दायित्व है कि ऐसी
घटनाओ पर लगाम लगाये.
वर्तमान में कानून की अवहेलना करना जैसे
एक खिलवाड़ बन चुका है, परिस्थितियाँ ऐसी बदल चुकी है कि अपराधियों में कानून का डर
समाप्त हो गया है. ईमानदार और कानून को मानने वाला व्यक्ति कानून से डरता है लेकिन
कानून को तोड़ने वाला नही. अपराधी निडर घूम रहे है. पुलिस आम आदमी का साथ देने की
बजाय अपराधियों का साथ देती है. प्रशासन में व्याप्त भ्रस्टाचार किसी से छिपा नही
है, शायद यही कारण है कि लोग पुलिस में जाने की बजाय दलालों और माफियाओ को ले देकर
अपना काम बना लेते है. कोरी अफवाहों पर यकीन करके उसका सच जाने बिना सोशल मीडिया
पर उसे फॉरवर्ड करना भी इसी भीड़तंत्र का एक प्रमुख हिस्सा है जो भीड़तंत्र द्वारा
की गयी हिंसा में ठीक वैसे ही काम करता है जैसे “आग में घी”.
सरकारों को सोशल मीडिया पर फैलती
अफवाहों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने ही होंगे और भीड़तंत्र द्वारा की जाने वाली
हिंसा में नामजद अपराधियों की जाँच कर उन्हें ऐसी सजा दी जाए जो भीड़ के लिए नजीर
बन जाए.
वर्तमान परिवेश में भीड़तंत्र को राजनीती
और सत्ता दोनों का समर्थन प्राप्त है, शायद यही कारण है कि अभी हाल ही में भीड़
द्वारा एक निहत्थे को मारने वाले युवको को भरी सभा में सत्ता के एक विधायक द्वारा
फूल माला पहनाई गयी थी. इस तरीके के कृत्य अपराधियों के हौसले बुलंद करते है, नेता
ये भूल जाते है कि जिन अपराधियों को, एक व्यक्ति को मारने पर वे माल्यार्पण/सहयोग कर
रहे है, कल को वे किसी विपक्षी नेता या पार्टी द्वारा और अधिक मदद या सहयोग करने
पर इससे भी ज्यादा हिंसा कर सकते है. ये बात तो सोलह आने सच है कि भीड़ को राजनीती
और सत्ता मिलकर जन्म देते है, उन्हें निर्देशित करते है, फिर भीड़ उनके नियंत्रण से
भी बाहर निकल जाती है और वह किसी की नही सुनती तत्पश्चात वो मंजर सामने आता है जिसकी
कल्पना भी नही की जा सकती.
भारत में भीड़ के द्वारा की जाने वाली
हिंसा के शिकार दलित, मुसलमान, हिन्दू, सिख सभी है. धर्म जाति जन्मस्थान या किसी
अन्य आधार पर भेदभाव को निभाने के लिए की गयी हिंसा में भीड़ मुख्य जरिया होती है.
भीड़ के द्वारा फैलाई जाने वाली हिंसा दरअसल तेजी से फैलाई जा रही मनोवृत्ति है
जिसे हिन्दू या मुस्लिम अस्मिता की स्थापना के नाम पर उभारा जा रहा है, पर एक वक्त
के बाद कोई सरकार चाहे वह इस भीड़ को सपोर्ट भी करे पर इसे नियंत्रित नही कर पायेगी.
इन सभी घटनाओ को देखने के बाद प्रश्न यही उठता है कि बिना किसी कारण, अफवाहों के
आधार पर भीड़ इकठ्ठा होती है और हत्या कर देती है.
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यही है कि जनता
को समझना होगा कि भीड़तंत्र के पीछे छिपे उन
घिनौने चेहरों, जो भीड़ को समय समय पर एहसास कराते रहते है कि यदि तुम हिंसा नही
करोगे तो मार दिए जाओगे. ये परिभाषा को त्यागकर लोगो को सोचना होगा कि समाज के संसाधन,
जमीन और पूंजी लूट ली जा रही है और लोग तैयार किये जा रहे है, भीड़ का हिस्सा बनने
के लिए.
सरकारों
को भी इस विषय पर मंथन करना होगा कि इस तरीके की घटनाओ का भारत के न्यू इंडिया में
कोई स्थान नही होना चाहिए फिर चाहे सरकार को कितने ही सख्त कदम ही क्यों न उठाने
पड़े ताकि विश्व पटल पर भारत के अनोखे “हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई” वाक्य पर कोई भीड़तंत्र
की गन्दी निगाह न पड़ सके.
अपूर्व बाजपेयी
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