भारत एक तेजी से पैर पसारता हुआ देश है, जहाँ
की आधिकाधिक आबादी युवा है और युवा आबादी से सीधा सा मतलब अपनी हर जरूरत के लिए
ईंधन, पर्यावरण को ताक पर रखना है. जहाँ पूरा विश्व विकास के लिए नए आयामों को
रचने के लिए प्रतिबद्ध है वहां भारत भी इसी दिशा में अग्रसर है. समय के साथ स्वयं
के लिए सुख के सभी साधन मनुष्य ने एकत्रित कर लिए है. तेजी से भागते समय के साथ
खुद का सामंजस्य बैठाने के लिए मनुष्य ने अपनी अभिलाषाओं में भी वृधि कर ली है.
तेजी से बढ़ते कारखाने, गाड़ियाँ, कार इनकी ही देन हैं पर मनुष्य को यह समझना होगा
कि प्रकृति में हर वस्तु का सीमित स्थान है एवं प्रकृति के द्वारा प्रदान किये गये
सभी संसाधन सीमित है.
ऊर्जा संरक्षण भारत में एक प्रमुख मुद्दा है,
किसी भी कार्य को अन्य तरीके से कर उस क्षेत्र की ऊर्जा बचाई जा सकती है पर मनुष्य
द्वारा समय के साथ खुद को भगाने की होड़ ने ऊर्जा संरक्षण के मुद्दे को सबसे पीछे की
कतार में लाकर खड़ा कर दिया है. ऊर्जा संरक्षण के उपायों के लिए राज्य की सरकारों
को ये सोचना होगा कि सडको पर तेजी से बढ़ते प्राइवेट वाहनों के स्थान पर पब्लिक
ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दिया जाए. आड इवन का तरीका भी काफी हद तक ऊर्जा संरक्षण का
एक अच्छा विकल्प है. सरकारों को किसी भी प्रकार के नियमो को लागु करने से पहले खुद
उन नियमो को अपने मंत्री, विधायको पर लागू करना होगा. सरकार को एक नियम के मुताबिक
हर मंत्री और विधायक को हफ्ते में एक दिन साइकिल व् एक दिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट का
इस्तेमाल कर अपने कार्यालय जाने सम्बन्धी फरमान सुनाना होगा, ऊर्जा संरक्षण के
अलावा जनता के बीच जाना भी इस नियम को फायदेमंद बना सकता है. शहरों में दिन
प्रतिदिन बढती कारो और स्कूली वाहनों पर भी नियंत्रण करना होगा.
जी
मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक सिंगापुर जैसे छोटे से देश में सड़क परिवहन को
बढ़ावा देने के लिए वहां की सरकार ने प्राइवेट वाहनों के दामो में इजाफा एवं रोड
टैक्स बढ़ा दिया. परिणामस्वरूप वहां काफी हद तक ऊर्जा संरक्षण में बढ़ोत्तरी हुई है.
सिंगापूर जैसे देश में केवल ३२ प्रतिशत घरो में ही कार है जबकि सिंगापुर एशिया के
समृद्ध देशो में से एक है.
किसी
भी प्रकार के नियम को असलीजामा पहनाने से पहले सरकार को उस पर अच्छे से अमल भी
करना होगा क्यूंकि भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना इतना आसान भी नही
है. भारत में बस की यात्रा को सुकून भरी नही बल्कि मज़बूरी में की गयी यात्राओं में
गिना जाता है फिर उसका कारन चाहे ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ होना हो या उस मार्ग पर
किसी अन्य वाहन की अनुपलब्धता.
तेजी
से विकासशील होने की कोशिशो में हर शहर में रोज बढ़ रहे अतिक्रमण भी पब्लिक
ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने में अपनी पूरी मदद करते है. सकरी रोड पब्लिक
ट्रांसपोर्ट द्वारा जाम लगवाने का उपयुक्त साधन हैं. घरों में प्रीपेड मीटर
लगवाकर, विद्यालयों में सेमीनार आयोजित कर, प्राइवेट वाहनों खरीदने हेतु
हतोत्साहित करने, कूड़े से गैस बनाकर ऊर्जा संरक्षण पर काफी काम सरकारों द्वारा
किया जा सकता है.
आज
भारत में कार खरीदना इतना आसान है कि आप दो दिन के अन्दर गाड़ी की चाबी अपने हाथों
में पा सकते हैं. भारत में पेट्रोल, डीजल जैसे पेट्रोलियम पदार्थो की बर्बादी का
सबसे बड़ा कारण बेमतलब खरीदे जाने वाले वाहन हैं. परिवार में पर्याप्त साधन उपलब्ध
होने के बाद भी अपनी काली कमाई को परिवहन साधन में खपाकर कुछ लोग इसे अपनी चालाकी
समझते हैं. सरकारों को इस विषय पर ध्यान देना होगा और एक ठोस नीति जिसके अंतर्गत
एक व्यक्ति एक तय समय में अन्दर दूसरा वाहन न खरीद सके, अपनानी होगी.
आजकल
सभी कॉलेज/ विद्यालय में हर तरीके के सेमीनार/ स्पेशल क्लासेज लगायी जाती है, परन्तु
ऊर्जा संरक्षण के ऊपर किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता, वाद विवाद का आयोजन कही नही
किया जाता है, जो कि नितांत खेदजनक है. विद्यालय प्रशासन को भी यह समझना होगा की
ऊर्जा संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी सरकार की ही नही है, उर्जसंराच्शन के लिए हर
व्यक्ति, विद्यार्थी को इसमें अपना पूरा सहयोग देना होगा तभी इस क्षेत्र में
प्रगति की जा सकती है. स्कूल, कॉलेज के वार्षिकोत्सव पर इस विषय पर विद्यार्थियों
के माता पिता की उपस्थिति में उन्हें यह समझाना होगा कि ईंधन की खपत केवल जरूरत के
समय की जाए जहाँ तक संभव हो साइकिल अथवा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लिया जाए.
कुल
मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि ऊर्जा संरक्षण के लिए भारत में अभी काफी कार्य होना
शेष है, हालाँकि इस क्षेत्र में संभावनाएं अपार है लेकिन चुनौतियाँ भी कम नही है.
सरकार और जनता दोनों को जमीनी स्तर पर उतारकर इस क्षेत्र में कदम से कदम मिलकर
चकना होगा वरना पेट्रोल डीजल जैसे पेट्रोलियम पदार्थ भी इतिहास में दर्ज हो
जायेंगे.......
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