16 दिसंबर की उस भयानक रात के कांड पर पहले ट्रायल कोर्ट फिर हाई कोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की फांसी की सजा शुरू से लेकर अब तक बरकरार कर भारत में एक नई मिसाल कायम की है। इस मामले ने भारत में दुष्कर्म के प्रति क़ानूनी प्रक्रियाओं और नजरिये को हमेशा के लिए बदल दिया।
हालाँकि अभियुक्तों के वकीलों को आपत्ति थी कि सारे आरोपियों को सामूहिक रूप से सजा सुनाई गयी, जबकि अपराध में सबकी अलग अलग भूमिका थी और उनकी सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि के हिसाब से सजा तय नही हुई है। पर सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी आपत्तियों को ख़ारिज करते हुए कहा कि यह अपराध जघन्यतम श्रेणी का अपराध है, इसमें ढिलाई कतई नही की जा सकती है।
इस फैसले से जहाँ पीड़ित परिवार के घर ख़ुशी का माहौल है कि चलो देर से ही सही पर उन्हें न्याय जरुर मिला है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से महिलाओ पर होने वाले अत्याचारों पर भी रोक लगेगी।
पर भारत में अभी भी हजारो निर्भयाये न्याय की आस में बैठी है, कि देर से ही सही पर उनको एक न एक दिन न्याय जरुर मिलेगा। निर्भया कांड के फैसले के बाद इन निर्भयाओ को भी बल मिलेगा।
महिलाओं के बारे में कुछ बातें सोचने पर मजबूर कर देती कि दिन प्रतिदिन बढ़ने वाली ये आपराधिक घटनाएँ। आज हम 21 वी सदी में महिला को समाज में माँ , बहन ,बेटी के रूप में पूजते है और देखते है पर इसी समाज का दूसरा छोर इसे निर्भया, दामिनी बनाकर इनकी जिन्दगी हमेशा के लिए नर्क बना देता है। आखिर महिलाओं को कब तक इन दोंनो असामान्य समाजों का सामना करना पड़ेगा। भारत में पुलिस भी है, न्यायालय भी है पर अपराध दिन ब दिन बढ़ रहे है। निर्भया कांड ने पूरे देश को, समाज को क्रोधित कर के रख दिया। पूरा देश सड़कों पर आ गया था पर इन सबके विरुद्ध देश में रोज सैकड़ों निर्भयाएँ प्रताड़ित की जाती है,उनके ऊपर एसिड फेंका जाता है। मीडिया जैसा शक्तिशाली माध्यम होने के बाबजूद इन अपराधो में रत्ती भर भी कमी नही आई है और इसके लिए आप किसी भी राज्य के आपराधिक ग्राफ का आंकड़ा उठा कर देख सकते हैं।
इस तरीके के अपराधों को अगर जड़ से मिटाना है तो इन सबमे पुलिस, कानून की भूमिका से बढ़कर समाज को अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी। कानून और पुलिस के पास बात अपराध होने के बाद जाती है जबकि समाज इन सबसे पहले जाग्रत होकर अपनी भूमिका निभा सकता है, तभी इस तरह के अपराधों पर अंकुश लगेगा वरना निर्भया और दामिनी जैसी हजारो निर्भयाएँ हमे अपना कर्तव्य निभाने को सवाल उठाती रहेंगी।

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